राजस्थान के जलदाय मंत्री कन्हैया लाल चौधरी का हालिया बयान कि "भ्रष्टों को घर भेजा तो विभाग खाली हो जाएगा", दरअसल भजन लाल सरकार की साख पर अपने ही मंत्री द्वारा पोती गई वह कालिख है, जिसे धोना अब मुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। यह बयान केवल एक प्रशासनिक लाचारी नहीं, बल्कि उस बौद्धिक और नैतिक दिवालियापन का सार्वजनिक ढिंढोरा है, जहाँ सत्ता ने मान लिया है कि वह ईमानदारी के दम पर सरकार चलाने का साहस खो चुकी है। मंत्री का तर्क वैसा ही है, जैसे कोई अस्पताल प्रबंधन यह कहे कि "डॉक्टर फर्जी और नीम-हकीम हैं, लेकिन उन्हें निकाल दिया तो अस्पताल खाली हो जाएगा, इसलिए मरीजों को उन्हीं के भरोसे मरने दिया जाए।" सवाल यह है कि क्या एक खाली अस्पताल, एक कातिल अस्पताल से बेहतर नहीं है। एक खाली पद को योग्य युवाओं से भरा जा सकता है, लेकिन एक भ्रष्ट अधिकारी पद पर बना रहकर पूरे तंत्र की रगों में जहर घोल देता है। पेयजल जैसे बुनियादी अधिकार को जब भ्रष्टाचार की ढाल बनाकर 'बचाया' जाता है, तो वह लोकतंत्र का सबसे क्रूर मजाक बन जाता है। जिस बीजेपी ने 'भ्रष्टाचार मुक्त राजस्थान' के वादे पर जनता का विश्वास जीता, उसी सरकार का एक कैबिनेट मंत्री आज भ्रष्ट तंत्र के सामने दंडवत खड़ा है। यह बयान न केवल पार्टी की विचारधारा पर बट्टा लगाता है, बल्कि यह संदेश देता है कि सरकार अब नीति से नहीं, बल्कि एक 'करप्ट माफिया' की ब्लैकमेलिंग से चल रही है। जब मंत्री खुद यह स्वीकार कर लें कि सरकार इन दागी अधिकारियों के बिना पंगु है, तो वह अनजाने में यह कह रहे होते हैं कि सत्ता का 'इकबाल' खत्म हो चुका है। क्या ऐसे 'लाचार' नेतृत्व को पद पर रहने का हक है। एक प्रशासनिक सर्जरी की जगह सड़ांध के साथ 'समझौता' करने वाले व्यक्ति को मंत्रिमंडल में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। यह 'लाचारी' दरअसल उन ईमानदार अधिकारियों के गाल पर तमाचा है जो व्यवस्था सुधारना चाहते हैं, और उन लाखों युवाओं के साथ विश्वासघात है, जो योग्यता के आधार पर सिस्टम में आने का इंतजार कर रहे हैं। यदि सरकार के पास भ्रष्टों का विकल्प नहीं है, तो यह नेतृत्व की सबसे बड़ी असफलता है। भ्रष्टाचार का कैंसर मरहम-पट्टी से ठीक नहीं होता, इसके लिए कठोर सर्जरी अनिवार्य है। मुख्यमंत्री को अब यह तय करना होगा कि वे अपने मंत्री के इस 'बौद्धिक सरेंडर' के साथ खड़े हैं या उस जनता के साथ जिसने बदलाव के लिए उन्हें चुना था। मंत्री के इस बयान ने विभाग को नहीं, बल्कि पूरी सरकार की साख को 'खाली' कर दिया है। यदि आज इन 'नीम-हकीम' अधिकारियों और उन्हें संरक्षण देने वाली सोच को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया गया, तो सुशासन केवल कागजों में दबकर रह जाएगा।
*महेश झालानी*
वरिष्ठ पत्रकार, जयपुर