जनता के हितों की बलि लेता कथित प्रशासनिक राजनीतिक गठबंधन

AYUSH ANTIMA
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ठेकेदारो व इंजिनियरों के कथित भ्रष्टाचार के उपर संबंधों को लेकर हिन्दी जगत के प्रसिद्ध लेखक मुंशी प्रेमचंद ने बहुत पहले कहा था जो आज भी प्रासंगिक हैं कि ठेकेदार व इंजिनियर का संबंध ठीक वैसा ही संभव है, जो शहद व मधुमक्खी का होता है, उससे उपजे मधूमास को भ्रष्टाचार की संज्ञा दी जा सकती है। मधुमक्खी यानी इंजिनियर व ठेकेदार दोनों मिलकर शहद (भ्रष्टाचार) को इकठ्ठा करते हैं। उक्त कथन को राजस्थान के बहुचर्चित जल जीवन मिशन योजना में महाघोटाले को देखें तो यह प्रशासनिक व राजनीतिक के कथित गठबंधन का एक नायाब उदाहरण है। इस घोटाले को देखें तो यह उच्चाधिकारियों, राजनेताओं व ठेकेदारों की मिलीभगत का परिणाम है कि सरकारी खजाने से करोड़ों रूपये की लूट के साथ जनता को पेयजल से वंचित रखने का एक ज्वलंत उदाहरण होने के साथ ही पानी जैसी मूलभूत सुविधा में जो बंदरबांट की है मानवता के उपर कलंक भी है। विदित हो कि ठेकेदारों ने इरकान (IRCON) जैसी केन्द्रीय कंपनियों के फर्जी सर्टिफिकेट का उपयोग कर टेंडर हासिल किए। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने इन फर्जी दस्तावेजों की अनदेखी की और जान बूझकर भुगतान किया। यह प्रशासनिक अनदेखी बिना राजनीतिक संरक्षण संभव नहीं हो सकती, तत्कालीन पूर्व मंत्री व उनके सहयोगियों पर कथित तौर पर भ्रष्टाचार में शामिल होने और ठेकेदारों को सुरक्षा प्रदान करने के आरोप लगे। इन आरोपों के चलते पूर्व मंत्री को जेल की हवा खानी पड़ी थी व इस मामले में अभी जमानत पर हैं। आरोप है कि कई जगहों पर पाइपलाइन या तो डाली ही नहीं गई या पुरानी व घटिया गुणवता वाली पाईप लाईन डालकर व उनको नया बताकर भुगतान उठा लिया गया। यह घोटाला यह साबित करता है कि कैसे नीतियाँ, जो आम नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए बनाई जाती है। यदि उनका कार्यान्वयन भ्रष्टाचार और प्रशासनिक राजनीतिक कथित सांठगांठ के तहत हो, वह भ्रष्टाचार का जरिया बन जाता है। इस कथित घोटाले को लेकर पूर्व आईएएस अधिकारी सुबोध अग्रवाल को गिरफ्तार कर लिया गया है, जो इस मामले के मुख्य सूत्रधार माने जाते हैं। यदि देखा जाए तो कांग्रेस राज में ठेकेदारो को राजनीतिक रसूखदारों का संरक्षण प्राप्त था तभी नियमों को ताक पर रखकर भुगतान किया गया। इस मामले की आंच दिल्ली तक भी पहुंच गई है क्योंकि सुबोध अग्रवाल ने पूर्व मुख्य सचिव सुधांश पंत पर भी शामिल होने का आरोप लगाकर सहआरोपी बना दिया है। सुधांश पंत का दिल्ली दरबार में दबदबा है, अब जांच एजेंसियों की साख भी दांव पर है कि कैसे सुधांश पंत से पूछताछ की जाए या लीपापोती कर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। अंत में यही कहा जा सकता है कि यह घोटाला इस बात की ओर इशारा करता है कि कैसे हर घर में नल से जल पहुंचाने जैसी जन कल्याणकारी योजना को भ्रष्ट गठजोड़ ने अपनी कमाई का जरिया बना लिया।

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