बहरोड़: मंथन चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर द्वारा ऑटिज़म एवेयरनेस मंथ के अंतर्गत विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में शुक्रवार को विश्व होम्योपैथी दिवस मनाया गया। वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक एवं रिहैब साइकोलॉजिस्ट डॉ.सविता गोस्वामी ने बताया कि होम्योपैथी के जनक डॉ.क्रिश्चियन फ्रेडरिक सैमुअल हैनिमैन के जन्मदिन, जो कि होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाया जाता है, के अवसर पर मंथन-सीडीसी व स्पेशल स्कूल के बच्चों के हाथों केक कटवाकर बधाई दी गई। कार्यक्रम के दौरान “ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर में होम्योपैथी की भूमिका” विषय पर अपने व्याख्यान में उन्होंने बताया कि ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक न्यूरो-डेवलपमेंटल अवस्था है, जो बच्चे के संचार, सामाजिक व्यवहार, सीखने की क्षमता तथा संवेदनात्मक प्रसंस्करण को प्रभावित करती है। प्रत्येक ऑटिज़्म से प्रभावित बच्चा अलग होता है और उसकी चुनौतियाँ तथा क्षमताएँ भी भिन्न होती हैं। ऐसे बच्चों के लिए समय पर पहचान एवं बहुआयामी उपचार अत्यंत आवश्यक है। ऑक्युपेशनल थेरेपी, स्पीच थेरेपी, बिहेवियर मोडिफिकेशन, सेंसरी इंटीग्रेशन थेरेपी इत्यादि के साथ यदि होम्योपैथिक दवाइयां भी दी जाएं तो बिना किसी दुष्प्रभाव के चमत्कारी परिणाम देखने को मिलते हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में बताया कि होम्योपैथिक चिकित्सा का आधार व्यक्ति-विशेष के अनुसार उपचार है। इसमें बीमारी के नाम के आधार पर नहीं बल्कि बच्चे के व्यवहार, मानसिक स्थिति, संवेदनशीलता, विकास क्रम, पारिवारिक इतिहास एवं शारीरिक लक्षणों का समग्र मूल्यांकन कर औषधि का चयन किया जाता है। इस प्रकार से चयनित दवाई यदि योग्य चिकित्सक की निगरानी में सही मात्रा व पोटेंसी में दी जाए तभी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। होम्योपैथी का उद्देश्य बच्चे के समग्र स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन, नींद, पाचन, चिंता, अतिसक्रियता एवं व्यवहार संबंधी समस्याओं में सहयोग प्रदान करना होता है। इससे केवल लक्षणों में कमी ही नहीं आती बल्कि बच्चे की संपूर्ण क्षमता का विकास होता है। अंत में डॉ.गोस्वामी ने सभी अभिभावकों से अपील की कि सिर्फ सोशल मीडिया पर किसी दवाई का नाम देखकर उसे अपने बच्चे को देना प्रारंभ न करें बल्कि चिकित्सकीय सलाह पर ही बच्चों को होम्योपैथी दवाई दें तभी अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।
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