महिला आरक्षण विधेयक को लेकर राजनीतिक दलों मे घमासान

AYUSH ANTIMA
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अप्रेल 2026 में महिला आरक्षण बिल (संविधान संशोधन विधेयक) लोकसभा में दो तिहाई बहुमत न मिलने से पास नहीं हो सका। इस बिल को पास करवाने को लेकर भाजपा ने लोकसभा का विशेष सत्र आहुत किया था। इस बिल के गिर जाने से पक्ष और विपक्ष में तीखी राजनितिक घमासान का दौर जारी है। भाजपा इसे महिला विरोधी कृत्य बताते हुए देशव्यापी प्रदर्शन कर रही है व अपने मंत्रियों, सांसदों व संगठन के प्रमुख चेहरों को देशव्यापी प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए मैदान में उतार दिया है कि केवल भाजपा ही एकमात्र राजनीतिक दल है, जो महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर प्रतिबद्ध है। विपक्ष ने इस बिल को अधूरा बताकर इसमें परिसीमन और जनगणना को लेकर सवाल खड़े किए हैं। विदित हो संसद और विधानसभाओं मे एक तिहाई आरक्षण देने वाला नारी शक्ति अधिनियम 106वां संवैधानिक संशोधन बिल पहले से ही लोकसभा व राज्यसभा द्वारा पारित किया जा चुका है। पंचायत और नगर पालिका स्तर पर 1993 में 73वें व 74वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से महिलाओं को पहले से ही आरक्षण मिला हुआ है। अब सवाल यह उठता है कि जो पंचायत व नगर पालिका स्तर पर आरक्षण लागू है, वह कितना सार्थक है, इसको लेकर मंथन करने की ज़रूरत है। जब से महिला प्रधान व नगर पालिका अध्यक्ष बनने लगी है तो एक नये पद का भी सृजन हुआ है, प्रधान व नगर पालिका अध्यक्ष पति। कुछ जगहों पर तो यह भी देखने को मिलता है कि महिला सरपंच व नगर पालिका अध्यक्ष घूंघट में बैठती है। उन आरक्षित पदों पर मनोनीत महिलाओं के सारे विधायी कार्य उनके पति ही करते हैं। यहां तक भी देखा गया है कि प्रधान, सरपंच या नगर पालिका अध्यक्ष पति बैठको की भी शोभा बढ़ाते नजर आते हैं। यह पंचायत व नगर पालिका स्तर पर आरक्षण का नमूना है। इस संवैधानिक व्यवस्था में कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार है, जो अनपढ महिला का चयन कर लेते हैं। अब यदि लोकसभा व विधानसभा में एक तिहाई बहुमत की बात करे, जो कानून बना हुआ है, उसकी परिपालना देश के राजनीतिक दल करते है। क्या एक तिहाई सीटों पर महिला उम्मीदवार को टिकट दिया जाता है। यदि ऐसा नहीं तौ महिला सशक्तिकरण की बात करना बेमानी होगा और यह पक्ष और विपक्ष के लिए एक राजनीतिक मुद्दा ही रहेगा।

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