भगवान परशुराम त्रेता युग के महान ऋषि थे। उनका जन्म भृगु वंश में अक्षय तृतीया के दिन हुआ था। वे अपने माता पिता की पांचवीं संतान थे। भगवान परशुराम को विष्णु के छठे अवतार के रूप में जाना जाता है। जन्म से उनके पिता ने उनका नामकरण संस्कार कर उनका नाम रामभद्र रखा। परशुराम आज के परिदृश्य में युवा पीढ़ी के लिए आदर्श है क्योंकि वे अपने बड़ों व माता पिता का बहुत सम्मान करते थे। उन्हीं आदर्शों को आज की युवा पीढ़ी को अपनाकर संस्कारवान बनाना चाहिए। भगवान परशुराम पक्षियों की बोली समझते थे तथा उनसे बात करने में पारंगत थे। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र व महर्षि ऋचीक के आश्रम में धनुष विधा ग्रहण की थी। उनकी असीम योग्यता से प्रभावित होकर महर्षि ऋचीक ने उन्हें सारंग नामक दिव्य धनुष प्रदान किया था। भगवान परशुराम शिव के अनन्य भक्त थे। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें विदुयदभि नामक परशु प्रदान किया था तभी से उनका नाम परशुराम हो गया। भगवान परशुराम को समाज में संतुलन स्थापित करने वाले और शोषित एवं दलित वर्ग के उत्थान के समर्थन के रूप में भी जाना जाता है। भगवान परशुराम ने समाज में समरसता और न्याय व्यवस्था को मजबूत करने का काम किया। भगवान परशुराम ने न केवल संहारक के रूप में काम किया बल्कि दलित व शोषित वर्ग के सम्मान के लिए भी काम किया। उन्होंने सभी वर्गों के कल्याण के लिए काम करने वाले लोक रक्षक के रूप में अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उन्होंने आततायी राजाओं का वध किया, जो समाज के भक्षक बने हुए थे।
भगवान परशुराम जगत में वैदिक संस्कृति का प्रचार प्रसार करना चाहते थे। भगवान परशुराम ने ब्राह्मण कुल में पैदा होकर शस्त्र धारण किया। उनके इस पुनीत कार्य ने यह साबित किया कि वर्ण जन्म से नहीं बल्कि उसके कर्म से निर्धारित होता है। भगवान परशुराम नारी सम्मान के लिए भी कटिबद्ध थे। भगवान परशुराम परम गौ भक्त थे। जब सहस्त्रबाहु ने ऋषि जमदग्नि के आश्रम से देवराज इन्द्र द्वारा प्रदत कामधेनु का हरण कर लिया तो परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने सहस्त्रबाहु का वध कर दिया। परशुराम सर्व समाज के आराध्य देव हैं, उनको एक खास समाज से बांधना उनके कद को छोटा करना है। उनको क्षत्रिय कुल विरोधी होने को लेकर प्रचारित किया गया लेकिन भगवान परशुराम उन आततायी क्षत्रियों के विरोधी थे और उन्हीं का वध किया, जो मानव जाति पर अत्याचार करते थे। उनके ब्राह्मण होने का प्रमाण इसी से प्रतीत होता है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने शिव धनुष का भंजन कर दिया तो परशुराम बहुत क्रोधित हो गए। राजा जनक की भरी सभा में उनका लक्ष्मण से वाद विवाद हो गया। जब उनको आभास हुआ कि भगवान राम भी विष्णु अवतार है और ऋषियों व मानव जन के कल्याण के लिए अवतार लिया है और राक्षसों का वध करने का संकल्प लिया है तो उन्होंने अपने सारंग धनुष पर प्रत्यंचा खींचने का भगवान राम से आग्रह किया। भगवान राम ने प्रत्यंचा खींची व बाण का संधान किया और उन्होंने भगवान परशुराम से कहा कि आप बताएं कि इस बाण से कहां वार करूं क्योंकि यह बाण बिना वार किए तरकश में नहीं आ सकता है। तब भगवान परशुराम ने कहा प्रभु इस बाण से मेरी यश और कीर्ति नष्ट कर दीजिए क्योंकि यह बाण जब जाएगा तो पृथ्वी पर मानव जाति को बहुत नुकसान पहुंचाने का काम करेगा। अपने यश और कीर्ति मानव हित में नष्ट करने का कार्य एक ब्राह्मण ही कर सकता है। ऐसे सर्व समाज के आराध्य देव भगवान परशुराम जो विष्णु के छठे अवतार होने के साथ इस ब्रह्माण्ड में आज भी अजर अमर है के जन्मोत्सव पर उनको नमन करता हूं और विप्र समाज का आह्वान करता हूं कि केवल परशुराम की जय का उद्घोष से ही समाज हित की इती श्री न करें बल्कि भगवान परशुराम ने जो समाज व मानव हित के लिए उच्चतम आयाम स्थापित किए हैं, उनके पदचिन्हों पर चलने का संकल्प लेकर सर्व समाज के हितों की रक्षा का भी संकल्प लें।