राजस्थान बीजेपी आज जिस भयावह ठहराव, दिशाहीनता और संगठनात्मक लकवे से जूझ रही है, उसकी जड़ें केवल बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में नहीं, बल्कि उस नेतृत्व की 'बौद्धिक कंगाली' में हैं, जो अपनी साख और प्रासंगिकता दोनों खो चुका है। प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ को लेकर पार्टी के गलियारों में अब यह सुगबुगाहट नहीं, बल्कि एक आक्रोश भरा शोर है कि वे एक 'विफल, रिमोट-कंट्रोल और बोझ' बन चुके अध्यक्ष हैं। उनके पास न तो राजस्थान की जटिल सियासत को समझने की सूक्ष्म दृष्टि है और न ही संगठन की रगों में जोश भरने वाला कोई स्वाभाविक नेतृत्व कौशल। प्रदेश अध्यक्ष का पद कभी रणनीति और संघर्ष का 'पावर हाउस' हुआ करता था, लेकिन राठौड़ ने इसे महज एक 'डाकखाने' में तब्दील कर दिया है, जहाँ फैसले जमीनी हकीकत को तौलकर नहीं, बल्कि दिल्ली या ऊंचे रसूखदारों की 'पर्चियों' को बांचकर लिए जाते हैं। इसका घातक परिणाम यह हुआ है कि जयपुर के प्रदेश मुख्यालय से लेकर सुदूर गांवों के अंतिम बूथ तक संगठन पूरी तरह 'कोमा' में चला गया है। कार्यकर्ता के पास न कोई मिशन है, न कोई विजन और न ही संघर्ष की कोई स्पष्ट लकीर।
राजस्थान जैसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से 'जादुई' राज्य में नेतृत्व के लिए जिस पैनी सूझ-बूझ की दरकार होती है, मदन राठौड़ वहां पूरी तरह 'मूक दर्शक' साबित हुए हैं। उनके सार्वजनिक वक्तव्यों की सतहीपन और रणनीतिक मौन ने बार-बार यह अहसास कराया है कि वे जनता की नब्ज और मुद्दों की गूंज पकड़ने में पूरी तरह अक्षम हैं। चाहे वह युवाओं के भविष्य से जुड़े भर्ती घोटाले हों या बेपटरी होती कानून-व्यवस्था। जब-जब सरकार को आईना दिखाने या विपक्ष के हमलों का मुंहतोड़ जवाब देने का वक्त आता है, तब-तब प्रदेश नेतृत्व या तो कुंभकर्णी नींद में सोया मिलता है या फिर अपनी ही पार्टी के लिए 'सेल्फ-गोल' करता नजर आता है। एक असली सेनापति की पहचान यह होती है कि समूचा कैडर उसकी एक आवाज पर लामबंद हो जाए, लेकिन राठौड़ की त्रासदी यह है कि कार्यकर्ता उनसे संवाद करने के बजाय उनसे दूरी बनाने में ही अपनी भलाई देख रहा है। आज संगठन में संवाद की जगह सन्नाटा है, विश्वास की जगह संशय है और प्रेरणा की जगह केवल पद का अहंकार बचा है। अनुशासन की धज्जियां उड़ाती गुटबाजी और गायब होती जवाबदेही इस बात का पुख्ता सुबूत है कि वे संगठन का 'नेतृत्व' नहीं कर रहे, बल्कि सिर्फ अध्यक्ष की कुर्सी पर 'अतिक्रमण' किए हुए हैं। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि राजनीति में शब्द ही सबसे धारदार शस्त्र होते हैं, लेकिन राठौड़ के लिए उनकी अपनी जुबान ही 'आत्मघाती दस्ता' बन गई है। उनके हालिया अपरिपक्व और विवादित बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें न तो अपने पद के गुरुत्वाकर्षण का अंदाजा है और न ही वे अपने शब्दों के दूरगामी राजनीतिक नुकसान को भांपने का विवेक रखते हैं। बीजेपी जैसी कैडर-आधारित और अनुशासित पार्टी के लिए प्रदेश अध्यक्ष उसकी रीढ़ की हड्डी होता है, लेकिन आज दुर्भाग्य से वही पद संगठन के लिए एक 'लायबिलिटी' यानी लाइलाज देनदारी बन चुका है। विपक्ष को जिस तरह से मुद्दे थाली में सजाकर मिल रहे हैं, उसने जमीनी कार्यकर्ता के आत्मसम्मान को रसातल में धकेल दिया है। मदन राठौड़ की अध्यक्षता ने अंततः यह यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या राजस्थान बीजेपी नेतृत्व के 'अकाल' के दौर से गुजर रही है। एक ऐसा व्यक्ति, जो स्व-विवेक से पूरी तरह रिक्त हो और केवल 'ऊपरी आदेशों की पर्ची' का गुलाम हो, वह किसी भी विराट दल को शिखर की ओर नहीं बल्कि अंधकार की गर्त में ही ले जाता है। राजनीति का क्रूर सच यही है कि अगर आपको अपनी साख बचानी है, तो उस 'बोझ' को उतार फेंकना ही होगा, जो प्रगति के पहियों के नीचे पत्थर बन गया हो। अगर बीजेपी को राजस्थान में फिर से वही 'शेर वाली दहाड़' और आक्रामकता लौटानी है, तो उसे यह कड़वी हकीकत माननी ही होगी कि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अब कोई समाधान नहीं, बल्कि स्वयं में सबसे बड़ी 'व्याधि' बन चुके हैं।
*महेश झालानी (वरिष्ठ पत्रकार, राजस्थान)*