भारतीय संसद में भाषाई गरिमा का पतन

AYUSH ANTIMA
By -
0


भारतीय संसद जो कभी पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, डाक्टर भीमराव अम्बेडकर व अटल बिहारी वाजपेई जैसे दूरदर्शी नेताओं और गरिमापूर्ण और विचार पूर्ण बहस का केंद्र थी, वही संसद आज नेताओं के अंधकारपूर्ण रवैये से असंसदीय भाषा की प्रयोगशाला बन गई है। संसद में साला शब्द उच्च मर्यादा व संवैधानिक मूल्यों का प्रतीक बन गया है और सत्ता पक्ष इस शब्द के प्रयोग करने वाले नेता का मेजे थपथपा कर हौसला बढ़ाते नजर आते हैं। भारतीय संसद में भाषाई गरिमा का पतन हमारे समृद्ध लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। जहां देश के आमजन की समस्याओं के निराकरण व मुद्दों पर बहस होनी चाहिए, उसका स्थान नारेबाजी, नारों और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप ने ले ली है। यह गिरावट सामूहिक है, जिसमें सत्तापक्ष व विपक्ष के नेता भाषाई सुचिता खोते नजर आ रहे हैं। यह गिरावट केवल एक राजनीतिक पार्टी तक ही सिमित नहीं है बल्कि देश के सभी राजनीतिक दलों के सांसद इसमें शामिल हैं और संस्थागत गरिमा को कमजोर कर रहे हैं। संसद में भाषा का यह स्तर न केवल चर्चाओं की गुणवत्ता को प्रभावित करता है बल्कि पूरे राष्ट्र को एक ग़लत संदेश भी देता है। भारतीय संसद जो लोकतंत्र के मंदिर के नाम से जानी जाती थी आज अपनी इज्जत व गरिमा को बचाने के लिए जद्दोजहद करती नजर आ रही है। यदि नेता प्रतिपक्ष की बात करें तो जिस तरह की भाषा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी संसद में प्रयोग कर रहे हैं, वह विपक्ष के नेता जैसे संवैधानिक पद की गरिमा के अनूरूप नहीं है। लोकतंत्र में आलोचना करने का पूरा अधिकार है लेकिन इसमें भाषाई सुचिता का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। असहमति की अभिव्यक्ति में शिष्टता, बौध्दिक गंभीरता और उचित भाषा का समावेश होना चाहिए। आपदा में राजनीतिक अवसर तलाशने की प्रवृत्ति का त्याग करना होगा। राष्ट्र प्रथम होना चाहिए, जब राष्ट्र की गरिमा ही नहीं रहेगी तो संसद गोण हो जायेगी। सत्तापक्ष को भी इस बात का भान होना चाहिए कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्ता अंको का खेल होती है व अंक पलटने की चाबी आमजन के हाथ मे होती है। सत्तापक्ष के जो नेता अंधकारपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं, उनको सोचना होगा कि भाजपा को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में बहुत से नेताओं की राजनीतिक तपस्या का फल है, जो सत्ता पर विराजमान हैं।‌ किसी भी राष्ट्रीय आपदा के विषय में देश के प्रतिपक्ष को भी विश्वास में लेना होगा। केवल बयानबाजी करने से स्थिति सामान्य नहीं होती, यथार्थ के धरातल पर देखेंगे तो पता चलेगा कि आमजन इस आपदा से कितने संकटों का सामना कर रहा है। हर बात पर नेहरू को जिम्मेदार ठहराने की मनोवृत्ति का त्याग करना होगा। भूतकाल से निकलकर वर्तमान की सोचने के साथ ही भविष्य के सुदृढ़ भारत के निर्माण की योजनाओं को क्रियान्वित करने की दिशा में पहल होनी चाहिए। संसद को चुनावी रैली न बनाकर इसकी गरिमा को उच्चतम स्तर तक ले जाने के प्रयास होने चाहिए।

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!