रसूखदारों की शह और सरकारी तंत्र की 'मौन स्वीकृति' से फल-फूल रहा अवैध कब्जों का खेल

AYUSH ANTIMA
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​निवाई (लालचंद सैनी): कानून की रखवाली का जिम्मा जिन कंधों पर है, जब वही कानून को ताक पर रख दें, तो व्यवस्था की तस्वीर कितनी शर्मनाक हो सकती है, इसका जीता-जागता उदाहरण शहर की नला रोड, जनता कॉलोनी और पहाड़ के पीछे स्थित चरागाह व सिवायचक भूमि पर देखा जा सकता है। सवाल यह उठता है कि जब प्रशासन इन गरीबों के आशियाने उजाड़ता है, तो उन रसूखदारों और अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती, जिन्होंने 'जेब गर्म' कर इन अवैध बस्तियों को बसाया और सरकारी सुविधाएं मुहैया कराई।

*​भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ा अतिक्रमण*

​शहर में चरागाह और सिवायचक भूमि पर कब्जा करना किसी अकेले व्यक्ति के बस की बात नहीं है। सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, रसूखदार लोग भोले-भाले लोगों से मोटी रकम लेकर उन्हें इन जमीनों पर बसाने की 'गारंटी' देते हैं। इसमें प्रशासनिक तंत्र की मौन स्वीकृति साफ नजर आती है। जब तक उच्च स्तर से दबाव नहीं आता, तब तक प्रशासन कुंभकर्णी नींद सोया रहता है, लेकिन जैसे ही कार्रवाई की बात आती है, गाज केवल उन गरीबों पर गिरती है, जिन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई इन मकानों में लगा दी।

*​बिना सुविधा कैसे संभव हुआ अतिक्रमण*

​सबसे बड़ा सवाल उन विभागों पर है, जो इन अवैध कॉलोनियों को 'वैध' जैसी सुविधाएं दे रहे हैं। 

*बिजली विभाग:* अवैध क्षेत्र होने के बावजूद धड़ल्ले से बिजली कनेक्शन दिए गए।
*जलदाय विभाग:* चरागाह भूमि पर पाइपलाइन बिछाकर पानी पहुंचाया गया।​
*नगर पालिका:* जिस जमीन को प्रशासन अवैध कहता है, वहां नगर पालिका ने सरकारी धन का दुरुपयोग कर सड़कें और रोड लाइटें बनवा दीं।
​यदि ये विभाग अपनी सुविधाएं न देते, तो शायद इन जमीनों पर अतिक्रमण करना नामुमकिन होता। अधिकारियों ने नियम-कायदों को ताक पर रखकर केवल अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है।

*​दोषी अधिकारियों पर कब होगी एफआईआर*

​जानकारों का मानना है कि सरकारी पद और धन के दुरुपयोग के इस मामले में संबंधित अधिकारियों पर धारा 420, 467 और 468 के तहत मुकदमा दर्ज होना चाहिए। आखिर क्यों आज तक केवल उन लोगों को ही अपराधी माना गया, जिन्हें रसूखदारों ने ठगा। उन चेहरों को बेनकाब क्यों नहीं किया जाता, जिन्होंने मोटी रकम लेकर इन अवैध बस्तियों को संरक्षण दिया।

*​जनता की मांग: हटे सरकारी सुविधाएं, तय हो जवाबदेही*

​शहर में अब यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि यदि प्रशासन इन मकानों को अवैध मानकर ध्वस्त करता है, तो वहां दी गई सरकारी सुविधाओं (सड़क, बिजली, पानी) को भी तुरंत हटाया जाए और उन अधिकारियों की संपत्ति की जांच हो, जिनके कार्यकाल में ये सुविधाएं प्रदान की गईं।

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