हाल ही में जिम्मेदारों की तरफ़ से एक बयान आया है कि यदि बेरोज़गार युवा गाय चराएँ तो सरकार उन्हें दस हज़ार रुपये देगी—युवाओं के लिए समाधान कम और उनके संघर्ष का उपहास अधिक प्रतीत होता है। यह वही सोच है, जिसने कुछ वर्ष पहले रोजगार के नाम पर पकोड़े तलने की सलाह दी थी। यह कोई बेरोजगारी का समाधान नहीं बल्कि युवाओं के आत्मसम्मान पर गहरा आघात है। प्रश्न यह है कि क्या पढ़ा-लिखा, प्रशिक्षित युवा—जिसने डिग्रियाँ हासिल कीं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपने जीवन के बहुमूल्य वर्ष झोंक दिए—उसे यही समझाया जाएगा कि उसकी योग्यता की क़ीमत दस हज़ार रुपये और एक रस्सी है। बेरोज़गारी आज केवल आर्थिक समस्या नहीं रह गई है। यह सामाजिक और मानसिक संकट का रूप ले चुकी है। सरकारी भर्तियाँ या तो वर्षों से रुकी हुई हैं या परीक्षाएँ समय पर नहीं हो रहीं। परिणाम आने में वर्षों लग जाते हैं। निजी क्षेत्र में स्थायी नौकरियाँ घट रही हैं और ठेका प्रथा, अस्थायी रोजगार तथा कम वेतन ने युवाओं के भविष्य को असुरक्षित बना दिया है। ऐसे समय में जब सरकार से ठोस समाधान की अपेक्षा होती है, तब ध्यान भटकाने वाले बयान सामने आते हैं। सवाल किसी काम की गरिमा का नहीं है। सवाल यह है कि क्या सरकार युवाओं को उनकी शिक्षा, योग्यता और क्षमता के अनुरूप अवसर उपलब्ध करा पा रही है। शायद जिम्मेदारों द्वारा रोजगार सृजन जैसे कठिन कार्य की बजाय अनर्गल बयानबाज़ी को आसान रास्ता समझ लिया गया है। युवा बेरोजगार भीख नहीं माँग रहा। वह मेहनत का अवसर माँग रहा है। वह सम्मानजनक और स्थायी रोजगार चाहता है, न कि व्यंग्यात्मक सुझाव। यदि सरकार वास्तव में युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर है, तो उसे उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना होगा और भर्ती प्रक्रियाओं को समयबद्ध व पारदर्शी बनाना होगा। युवा देश की ताक़त है, बोझ नहीं। उनकी समस्याओं पर उपहास नहीं, समाधान चाहिए। क्योंकि जब युवाओं की उम्मीदें टूटती हैं, तो उसके दुष्परिणाम एक परिवार को ही नहीं, समाज और देश को भी प्रभावित करते हैं।
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