बाबा गुरु मुखि ज्ञाना रे, गुरु मुखि ध्यानां रे॥ गुरु मुखि दाता, गुरु मुखि राता, गुरु मुखि गवनां रे। गुरु मुखि भवनां, गुरु मुखि छवनां, गुरु मुखि रवनां रे॥
गुरु मुखि पूरा, गुरु मुखि शूरा, गुरु मुखि वाणी रे। गुरु मुखि देणा, गुरु मुखि लेणा, गुरु मुखि जाणी रे॥ गुरु मुखि गहबा, गुरु मुखि रहबा, गुरु मुखि न्यारा रे। गुरु मुखि सारा, गुरु मुखि तारा, गुरु मुखि पारा रे॥ गुरु मुखि राया, गुरु मुखि पाया, गुरु मुखि मेला रे। गुरु मुखि तेजं, गुरु मुखि सेजं, दादू खेला रे।।अर्थात हे साधक ! गुरु के मुखारविन्द से वेदान्त वाक्यों का श्रवण-मनन करने से आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है। ध्यान करने की विधि,दान देने का प्रकार, प्रभु भक्ति का मार्ग, जिस मार्ग में चलने से प्रभु में प्रेम पैदा होता है, सर्वाधिष्ठान परमात्मा का ज्ञान भी गुरुमुख से ही प्राप्त होता है। आत्मज्ञान की निष्ठा, उसमें स्थिति और उससे आनन्द प्राप्ति की विधि, आत्मा की पूर्णावस्था का ज्ञान, साधन में शूरवीरता तथा वाणी से प्रिय उच्चारण का ज्ञान गुरु कृपा से ही मिलता है। उपदेश का प्रकार, उसको धारण करने की विधि, अपने स्वरूप में स्थित रहने की विधि, सांसारिक कामनाओं से दूर रहने का तरीका, तत्त्वज्ञान का सार, संसार को पार करने की विधि, निरपेक्षता का ज्ञान-ब्रह्म प्राप्ति का ज्ञान तथा ब्रह्म का प्रकाश,हृदय-शय्या पर परमात्मा की अनुभूति, पराभक्ति और ब्रह्मानन्द के साथ क्रीड़ा की विधि,ब्रह्म में जीव की अभेद स्थिति,यह सब गुरु के द्वारा ही प्राप्त होते है। अतः जीवन मे गुरु की परम् आवश्यकता है।