दादू कहि कहि मेरी जीभ रही, सुणि सुणी तेरे कान। सतगुरु बपुरा क्या करै, जो चेला मूढ अजाण। सन्तप्रवर श्रीस्वामी दादूदयाल जी महाराज कहते है कि, दुराग्रही मंदबुद्धि शिष्य को गुरु भी शिक्षा देने में असमर्थ है क्योंकि वह हठी और अल्पबुद्धि होता है। बार-बार कहने-सुनने से भी उसकी बुद्धि ज्ञान को ग्रहण करने में समर्थ नहीं होती। इसमें गुरु का कोई दोष नही, ऐसा शिष्य हेय माना गया है।
श्रीमद्भगवतगीता में कहा गया है कि श्रद्धा ना रखने वाला, अज्ञानी एवं संशयालु शिष्य नष्ट हो जाता है। संशयात्मा का तो विनाश ही होता है। भर्तहरि जी महाराज ने लिखा है कि विधाता ने जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं बनाई, जिसका कोई उपयोग न बनाया हो किंतु मूर्ख की चित्त वृत्ति को नष्ट करने के लिए विधाता ने पराजय स्वीकार कर ली।
*मुर्ख के पांच लक्षण होते हैं*
1. वह अंहकारी होता है।
2. वह खोटे वचन बोलता है।
3. वह आलसी होता है।
4. प्रमादी और दुराग्रहग्रस्त होता है।
5. अतः ऐसे मूर्ख शिष्यों को उपदेश नहीं देना चाहिए