कचरा प्रबंधन: उत्तरदायी शासन की कसौटी

AYUSH ANTIMA
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भारत में कचरा प्रबंधन आज केवल स्वच्छता का विषय नहीं रह गया है; यह सुशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय न्याय की गंभीर परीक्षा बन चुका है। तीव्र शहरीकरण, बदलती उपभोग प्रवृत्तियाँ और पैकेजिंग-आधारित अर्थव्यवस्था ने नगर ठोस कचरे (Municipal Solid Waste) की मात्रा को निरंतर बढ़ाया है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार देश में प्रतिवर्ष लगभग 60–65 मिलियन टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से प्रतिदिन लगभग 1.5 लाख टन कचरा शहरी क्षेत्रों से निकलता है। संग्रहण व्यवस्था में सुधार अवश्य हुआ है, परंतु वैज्ञानिक प्रसंस्करण अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाया है। परिणामस्वरूप, कचरे का बड़ा भाग खुले डंपिंग स्थलों और लैंडफिल में जमा होकर पर्यावरणीय संकट को जन्म दे रहा है। देश के अनेक महानगरों के बाहरी हिस्सों में खड़े “कचरे के पहाड़” इस चुनौती की प्रत्यक्ष तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। दिल्ली का गाज़ीपुर लैंडफिल और मुंबई का देवनार डंपिंग ग्राउंड वर्षों से पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का केंद्र रहे हैं। इन स्थलों से निकलने वाला लीचेट भूजल को प्रदूषित करता है, जबकि मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें जलवायु परिवर्तन को गति देती हैं। समय-समय पर लगने वाली आग वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है, जिसका सीधा असर आसपास के समुदायों,विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति का संकेत है।
प्लास्टिक अपशिष्ट ने इस संकट को और जटिल बना दिया है। अनुमान है कि भारत में प्रतिवर्ष 9 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लागू होने के बावजूद व्यवहार और बाजार-व्यवस्था में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आया है। माइक्रोप्लास्टिक अब नदियों, मिट्टी और खाद्य श्रृंखला तक पहुँच चुका है। यह अदृश्य प्रदूषण दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न कर रहा है, जिनका वैज्ञानिक मूल्यांकन अभी प्रारंभिक अवस्था में है।
राजस्थान जैसे राज्य, जहाँ पारंपरिक रूप से संसाधनों के संरक्षण की समृद्ध विरासत रही है, भी इस चुनौती से अछूते नहीं हैं। जयपुर में लांगड़ियावास डंपिंग साइट वर्षों तक पर्यावरणीय चिंता का विषय रही। बायो-माइनिंग की प्रक्रिया के माध्यम से ‘लेगेसी वेस्ट’ के निष्पादन का कार्य प्रारंभ किया गया है, जिससे भूमि पुनःउपयोग की संभावना बनी है। उदयपुर जैसे पर्यटन-आधारित शहरों में स्रोत-स्तर पर पृथक्करण और होटल उद्योग की भागीदारी से बेहतर प्रबंधन की दिशा में प्रयास हुए हैं। कोटा में जीपीएस-आधारित मॉनिटरिंग और डोर-टू-डोर कलेक्शन को सुदृढ़ करने के प्रयास यह संकेत देते हैं कि स्थानीय प्रशासन नवाचार की दिशा में अग्रसर है।
फिर भी, कचरा प्रबंधन की सबसे बड़ी संरचनात्मक चुनौती स्रोत-स्तर पर छंटाई की कमी है। जब घरों और संस्थानों में गीला, सूखा और खतरनाक कचरा अलग नहीं किया जाता, तो पूरी शृंखला बाधित हो जाती है। परिणामस्वरूप पुनर्चक्रण की संभावनाएँ घटती हैं और लैंडफिल पर निर्भरता बढ़ती है। यह स्पष्ट है कि केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं; व्यवहारगत परिवर्तन अनिवार्य है। स्वच्छ भारत मिशन (Urban) 2.0 के अंतर्गत ‘गार्बेज-फ्री सिटी’ की अवधारणा ने प्रतिस्पर्धी और परिणाम-आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया है। कई शहरों ने 100 प्रतिशत डोर-टू-डोर कलेक्शन और आंशिक स्रोत-वर्गीकरण में उल्लेखनीय प्रगति की है। कम्पोस्टिंग प्लांट, मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) और वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजनाएँ सकारात्मक पहल हैं। परंतु इन पहलों की स्थिरता नागरिक सहभागिता पर निर्भर है। यदि प्रत्येक परिवार गीले कचरे का घरेलू कम्पोस्ट बनाए और सूखे कचरे को पृथक करे, तो लैंडफिल पर जाने वाले कचरे की मात्रा में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। नीतिगत स्तर पर विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) का कठोर क्रियान्वयन समय की आवश्यकता है। उत्पादकों को अपने उत्पाद के जीवन-चक्र के अंतिम चरण तक उत्तरदायी बनाना होगा। डिजिटल ट्रैकिंग, डेटा-आधारित निगरानी और पारदर्शी रिपोर्टिंग प्रणाली नगर निकायों की कार्यक्षमता बढ़ा सकती है। साथ ही, वित्तीय संसाधनों और क्षमता निर्माण में निवेश आवश्यक है, ताकि नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी कम हो सके। कचरा प्रबंधन को केवल एक अभियान के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह पर्यावरणीय सततता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और उत्तरदायी शासन की संयुक्त कसौटी है। जब तक नागरिक और प्रशासन समान रूप से उत्तरदायित्व नहीं निभाएँगे, तब तक डंपिंग ग्राउंड बढ़ते रहेंगे और समस्या गहराती जाएगी।
समय आ गया है कि हम कचरे को “समस्या” नहीं, बल्कि “संसाधन” के रूप में देखें और जैविक कचरे को खाद, प्लास्टिक को पुनर्चक्रित उत्पाद और अपशिष्ट को ऊर्जा में परिवर्तित करने की सोच के साथ आगे बढ़ें। संसाधन-संरक्षण की परंपरा से समृद्ध भारत यदि इस दिशा में सामूहिक संकल्प ले, तो स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य केवल लक्ष्य नहीं, बल्कि वास्तविकता बन सकता है।

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