धर्म और राजनीति का घालमेल

AYUSH ANTIMA
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धर्म और राजनीति का घालमेल भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश मे एक जटिल व विवादास्पद मुद्दा है। यह अक्सर सांस्कृतिक पहचान, चुनावी लाभ और सामाजिक ध्रुवीकरण को प्रभावित करता है। धर्म का नैतिक पक्ष लोक कल्याण में सहायक होना है लेकिन इसकी आड़ में सांप्रदायिकता और सामाजिक विभाजन की तरफ ले जाने का काम हो रहा है। भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में देखा जाए तो हर राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति के चलते इसको प्रभावित करने के लिए धर्म और जाति का उपयोग कर रहे है। यह राजनितिज्ञ धर्म निरपेक्षता का चोला खूंटी पर टांगकर धार्मिक प्रतीकों के सहारे सत्ता हासिल करने की प्रयोगशाला बन चुका है। राजनीति में धर्म का घालमेल खतरनाक परिणाम देने वाला होता है। इन परिणामों में सामाजिक समरसता खत्म होकर सम्प्रदायिक तनाव व दंगो के रूप में देखे गये है। इस तरह का घालमेल विचारधाराओं को प्रभावित करने के साथ ही विकास के स्थान पर भावनात्मक मुद्दों को प्रमुखता देते हैं। यदि देश के संविधान की बात करें तो संविधान का अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। देखा जाए तो धर्म का उपयोग व्यक्तिगत विश्वास के बजाय सत्ता प्राप्ति के हथियार के रूप में किया जाना हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ख़तरनाक परिणाम देने वाला है। धर्म और राजनीति के घालमेल से समाज और राष्ट्र में उन्माद, अराजकता और अशांति का माहौल बन जाता है। तथाकथित धर्म के ठेकेदार एवं धर्मगुरु राजनीतिक मंचो का उपयोग करते हुए खुद को चमकाने में लगे है। व्यासपीठ का राजनीतिकरण हो रहा है। हमारे धार्मिक त्यौहार भी अपना वास्तविक स्वरुप खोकर राजनिती के चंगुल में फंसे हुए हैं। इस तरह से धर्माचार्य और राजनितिज्ञ दोनो ही अपने स्वार्थ सिद्धी में लगे हुए हैं। सार्वजनिक मंचों से राजनीतिक दलों के भाषण धार्मिक वैमनस्यता, नफरत, घृणा, जातिगत को बुरा मानते है और उनके भाषण सुनने में बहुत ही अच्छे लगते है लेकिन व्यवहार में शून्य ही नजर आता है। धर्म आडंबर व पाखंड का विषय नही है और न ही बड़े बड़े धार्मिक आयोजनों की आड़ में स्वार्थ सिद्धी व खुद की प्रसिद्धि पाने का साधन है। धर्म किसी भूखे को खाना खिलाना, दुर्बल व असहाय व्यक्ति की सहायता करना, व्याकुल व्यक्ति को आत्मिक शांति देकर उसके जीवन में खुशी लाना है। धर्म एक संजीवनी की तरह होता है लेकिन इसका विष की तरह प्रयोग किया जा रहा है। आज के परिवेश में भारत को सशक्त भारत बनाने की दिशा में बढ़ना है तो ऐसे धर्म की स्थापना करनी होगी, जो अशांति में से शांति ढूंढ निकाले, हिंसा खत्म करके लोगो को अहिंसा व भाईचारे की तरफ ले जाने की प्रेरणा देने के साथ ही अंधकार में से प्रकाश को पा ले।

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