सिन्धी समाज के सक्रिय सदस्य को अपमानित करने का विरोध

AYUSH ANTIMA
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​जयपुर: राजधानी जयपुर में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक गरिमा के हनन का एक गंभीर मामला सामने आया है, जहाँ पूज्य सिंधी सेन्ट्रल पंचायत जयपुर महानगर द्वारा जारी 'बहिष्कार आदेश' के विरुद्ध सिन्धी समाज के सम्मानित एवं सक्रिय सदस्य जयप्रकाश बुलचंदानी ने विधिक मोर्चा खोलते हुए संस्था के शीर्ष पदाधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजा है। पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता अतुल दीक्षित के जरिए भेजे गए इस विधिक नोटिस में राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष एवं सिन्धी समाज के मुख्य संरक्षक वासुदेव देवनानी, समाज के अध्यक्ष गिरधारी लाल मनकानी, महासचिव धर्मदास मोटवानी, मुख्य मार्गदर्शक नारायण दास नाज़वानी और कोषाध्यक्ष अशोक छाबड़ा को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया है। ​यह विवाद तब गहराया, जब संस्था के आधिकारिक लेटरहेड पर गत 18 फरवरी को एक पत्र भेजकर बुलचंदानी को समाज से 'बहिष्कृत' घोषित किया गया। साथ ही समाज के लोगों को उनसे समस्त 'रिश्ते-नाते और उठना-बैठना' बंद करने का अवैध निर्देश दिया गया। इस कृत्य को सर्वोच्च न्यायालय के उन ऐतिहासिक नज़ीरों के विरुद्ध बताया गया है। इनमें स्पष्ट उल्लेख है कि कोई भी पंचायत या संस्था किसी नागरिक का 'सामाजिक बहिष्कार' नहीं कर सकती। नोटिस में इस कार्यवाही को मध्यकालीन संकीर्ण मानसिकता का परिचायक बताते हुए इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के अंतर्गत प्राप्त 'सम्मान के साथ जीवन जीने' के मौलिक अधिकार का जघन्य उल्लंघन करार दिया गया है। ​विधिक नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि बिना किसी ठोस साक्ष्य या पूर्व सूचना के निराधार और मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर इस बहिष्कार पत्र को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर जानबूझकर सार्वजनिक किया गया, जिससे प्रार्थी की सामाजिक छवि को अपूरणीय क्षति पहुँची है और उन्हें गहरा मानसिक आघात लगा है। इस कृत्य को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 356 (मानहानि), 351 (आपराधिक धमकी) एवं धारा 61 (आपराधिक षड्यंत्र) सहित आईटी एक्ट की सुसंगत धाराओं के तहत गंभीर दंडनीय अपराध माना गया है। इसलिए विपक्षी को इस नोटिस के माध्यम से अंतिम चेतावनी देते हुए निर्देशित किया गया है कि वे तीन दिन में इस अवैध बहिष्कार नोटिस को तत्काल प्रभाव से वापस लेवे। साथ ही जिस माध्यम से यह भ्रम फैलाया गया, उसी माध्यम से सार्वजनिक रूप से लिखित माफीनामा जारी करें। इसके साथ ही प्रार्थी की सामाजिक प्रतिष्ठा को पहुँची अपूरणीय हानि की क्षतिपूर्ति के लिए पचास लाख रुपए के भुगतान की मांग की गई है। निर्धारित समय सीमा में अनुपालन नहीं होने की स्थिति में प्रार्थी द्वारा सक्षम न्यायालय में दीवानी एवं फौजदारी कार्यवाही अमल में लाई जाएगी, जिसकी समस्त विधिक जिम्मेदारी व्यक्तिगत एवं संस्थागत रूप से विपक्षीगण की होगी। यह संघर्ष अब केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि धन और सत्ता के अहंकार के विरुद्ध सामाजिक स्वाभिमान की रक्षा का प्रतीक बन गया है।

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