विराट हिन्दू सम्मेलनों की सार्थकता

AYUSH ANTIMA
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सनातन धर्म के मुख्य चार स्तम्भों में सत्य, तप यानी आत्म अनुशासन, दया और दान प्रमुख हैं, जो जीवन मे संतुलन, नैतिकता और आध्यात्मिक उन्नति सुनिश्चित करते हैं। इसमें सत्य का भौतिक अर्थ है जीवन में सच्चाई का पालन करना और स्वीकार करना। तप आत्म नियंत्रण, अनुशासन और साधना जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है। सभी जीव चराचर चाहे वह जल, नभ या पृथ्वी पर वास करता हो, उनके प्रति करूणा का भाव, सहानुभूति और अहिंसा का भाव रखने के साथ ही स्वार्थ रहित होकर समाज व जरूरतमंदों की सेवा करना। गौ, गंगा और गायत्री ये सनातन संस्कृति की पवित्रता, ज्ञान और नैतिकता के प्रतीक माने जाते हैं। सनातन धर्म मे गौ माता केवल पशु नहीं बल्कि ममता, पवित्रता और सभी देवताओं का वास रखने वाली माना गया है। जिस घर में गौ माता का वास होता है, वहां नकारात्मक ऊर्जा का नाश होने के साथ ही सुख समृद्धि आती है। विराट हिन्दू सम्मेलन सनातन संस्कृति को मजबूत करने, समाज में एकता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक व नैतिक चेतना को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण मंच है। ऐसे सम्मेलनों की सार्थकता तभी संभव है, जब भेदभाव मिटाकर हिन्दू समाज को एकजुट करने और राष्ट्र निर्माण के विचारों का संचार हो। यदि ऐसे आयोजनों को लेकर यह कहा जाए कि यह एक भारत श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना को साकार करने वाले हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। समाज के युवाओं को व्यसनों जैसे नशीले पदार्थ व धूम्रपान से दूर रखकर पर्यावरण व सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम कहा जा सकता है। संयुक्त परिवार सनातन धर्म का आधार रहा है। इसी परिकल्पना को लेकर सामूहिक भजन और पंगत में बैठकर सामूहिक भोजन होना चाहिए। इससे समाज में आपसी मेलजोल बढ़ता है और भेदभाव की भावना समाप्त होती है। यह हिन्दू धर्म की प्राचीन परम्परा है, जिसको बढ़ावा देने की जरूरत है। युवा पीढ़ी किसी भी समाज व देश की रीढ़ होती है, यह वह नींव के पत्थर की तरह होती है, जिस पर संस्कारवान भवन का निर्माण संभव है। आज के परिवेश में आधुनिकता व अर्थ की अंधी दौड़ ने हमारी युवा पीढ़ी को सनातन के महान मूल्यों से विमुख कर दिया है। इसी के चलते एकल परिवारो का चलन भी बढ़ा है। युवा पीढ़ी को सनातन के प्रति निष्ठा रखने के लिए ऐसे आयोजनों में उनकी ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। किसी भी सभ्य समाज का आधार उसका भेदभाव, जाति-पाति रहित विचार होते हैं। आज देश में जिस तरह से धर्मांतरण के मामले प्रकाश में आ रहे हैं, उस पर अंकुश लगाकर सनातन धर्म की मुख्यधारा में लाने के प्रयास होने चाहिए। परिवार को संस्कारित करने के बाद समाज व राष्ट्र का नंबर आता है। जब हमारे परिवार ही संस्कारवान नहीं होंगे तो संस्कारवान राष्ट्र की परिकल्पना करना बेमानी होगा। यह देखा गया है कि हिन्दूओ की लड़कियों को बहला फुसलाकर दूसरे धर्म में शादी करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जो सनातन के लिए ख़तरनाक स्थिति है। किसी भी परिवार को संस्कारित करने में मातृ शक्ति का विशेष योगदान रहता है, अतः नारी सशक्तिकरण की दिशा में उचित प्रयास होने के साथ ही नारी को समाज में उचित स्थान व प्रतिनिधित्व मिलने की दिशा में प्रयास होने चाहिए। ऐसे आयोजनों को लेकर हमें जो हमारे संतों, धर्माचार्यों व प्रबुद्धजनों के विचार सुनने को मिलते हैं, उनको हमारे जीवन में अंगीकार करे तभी ऐसे आयोजनों की सार्थकता सिद्ध होगी।

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