आज के कथा वाचक व्यासपीठ का राजनितीकरण करते नजर आ रहे है। देखा जाए तो दूसरे शब्दों में व्यासपीठ का राजनीतिक उपयोग धार्मिक आयोजनों के माध्यम से जनमत को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है। यह मंच अब सिर्फ आध्यात्मिक उपदेश तक सिमित न रहकर, कथावाचकों द्वारा राजनीतिक संदेश देने, किसी विशेष राजनीतिक दल का समर्थन करने या उनकी विचारधारा फैलाने के उपयोग मे किया जा रहा है। कथावाचक अप्रत्यक्ष या सीधे तौर पर अपनी आध्यात्मिक कथा के दौरान राजनीतिक नेताओं की प्रशंसा कर मतदाताओं को प्रभावित करते नजर आते हैं। वर्तमान परिदृश्य मे यह देखा गया है कि कुछ कथावाचक व्यासपीठ से केवल धर्म या आध्यात्मिक उपदेश न देकर सीधे तौर पर राजनितिक दलों या मुद्दों पर अपनी राय रखने लगे हैं, जो कभी कभी विवाद का रूप ले लेती है। व्यासपीठ से कथावाचकों और राजनीति संबध गहराता जा रहा है, जहां आध्यात्मिक उपदेशो का उपयोग सामाजिक संदेश देने व सनातन धर्म की परम्पराओं से रूबरू करने के बजाय राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए हो रहा है। सत्ताधारी व विपक्षी दल अपनी राजनीतिक पैठ बढ़ाने के लिए कथावाचकों का उपयोग कर रहे हैं। यही कारण है कि कथावाचक विवाद का विषय बनते नजर आ रहे हैं। भारत में धार्मिक भावनाओं को बहुत ही जल्द भुनाया जा सकता है क्योंकि यह वही धार्मिक भावनाओं का देश है कि गणेश जी की प्रतिमा दूध पीती है, सुनकर मंदिरों में लाईन लग गई थी। इसी आध्यात्मिक व धार्मिक भावनाओं का फायदा उठाते हुए कथावाचक अपनी राजनीति चमकाने में लगे हुए हैं। देखा जाए तो भजन गायक भी पीछे नहीं है, अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते एक राजनीतिक दल के भौपू बने हुए हैं। व्यासपीठ से आध्यात्मिक प्रवचनों के साथ सामाजिक समरसता बढ़ाने वाले व्याखानों को प्राथमिकता देनी चाहिए। किसी राजनीतिक दल का भौपू न बनकर समाज के प्रति जो उनका उत्तरदायित्व है, उसको बखूबी निभाने में अपनी भूमिका का निर्वहन करना होगा। सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार व उसमें जुड़ी धार्मिक मान्यताओं और परम्पराओं का बखान करना ही व्यासपीठ का उद्देश्य होना चाहिए। भारत में धर्मान्तरण एक एक भयंकर बीमारी का रूप धारण कर रहा है। सुनियोजित तरीके से लोगों को भ्रमित कर धर्मांतरण के मामले प्रकाश में आ रहे हैं। कथावाचकों को चाहिए व उनका दायित्व भी बनता है कि इस बीमारी से बचने को लेकर पूरा प्रचार करें व युवा पीढ़ी खासकर लड़कियां लव जिहाद मे फंस रही है, उससे बचाने के लिए समाज में सुसंस्कृत व संस्कारों का बीजारोपण करें।
देश में बहुत से संतो का राजनीति में पर्दापण होने से इनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ गई है। व्यासपीठ की गरिमा को ध्यान में रखते हुए इसका विशुद्ध आध्यात्मिक, धार्मिक व सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए होना चाहिए न कि इसे राजनीतिक मंच बनाकर प्रदूषित करना चाहिए।