भारतीय राजनीति व राजनेताओं की धुरी केवल जातिवाद व धर्म तक ही सिमट कर रह गई है। वह समय याद कीजिए, मंडल और कमंडल की राजनीति ने देश में सामाजिक समरसता नष्ट करने का काम किया। क्या जातिगत आरक्षण ही कम था कि सरकार यूजीसी 2026 लाकर समाज को बांटने की कथित कोशिश हो रही है। दलित व सवर्ण शब्द केवल राजनीतिक दलों के हथियार है और इन हथियारों के बलबूते अपने वोट बैंक को सुरक्षित करते हैं। अब यदि सवर्ण जाति की बात की जाए तो क्या इस जाति में गरीबी नहीं आती, क्या सवर्ण जाति में पैदा होना इस देश में दुर्भाग्य हो गया है। बांटोगे तो कटोगे का उद्घोष करने वाले राजनेता अपनी राजनीतिक विरासत को सुदृढ़ करने के लिए समाज को बांटने का काम कर रहे हैं। सनातन धर्म पर संकट की बात कर अपना निजी स्वार्थ साधने वाले देश के सफेदपोश सनातन धर्म को कमजोर करने में लगे हैं। जो कथावाचक अपने धार्मिक आयोजनों में एक विशेष राजनीतिक दल के गुणगान करता है, उनको सर आंखों पर बैठाया जा रहा है। यहां तक उनको सुरक्षाकर्मी दिये जा रहे हैं और जो सरकार से सवाल करते है, उनको अपमानित किया जा रहा है। भगवा वस्त्र सनातन की परम्परा रही है और इस भगवा बाने का सम्मान होना चाहिए। यह कैसी विडम्बना है कि शिक्षा के मंदिरों में सभी जाति के शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करते हैं और उस पवित्र मंदिर को भी जातियों में बांटकर समाज में बंटवारे के बीजारोपण का काम हो रहा है। जब यह सामाजिक विषैला बीज पेड़ बनेगा, उस समय की स्थिति का शायद ही इन राजनीतिक आकाओं को आभास होगा। एक तरफ जातिवाद को खत्म करने की बात हो रही है तो दूसरी तरफ जातिवाद के विषैले बीज युवा पीढी में रोपित किए जा रहे हैं। कानून बनाना किसी भी सरकार का विशेषाधिकार होता है लेकिन किसी भी कानून को लेकर सर्वसम्मति बनाना व समाज के हर वर्ग को विश्वास में लेना होता है। यदि अहंकार में आकर कोई कानून जनमानस पर लादने की कोशिश होती है तो उसका हश्र किसान बिल को वापिस लेकर सरकार देख चुकी है। जन आंदोलन के समक्ष सरकार की चूले हिलते देखी गई है, जिनको कभी आभास भी नहीं था कि सत्ता से पदच्युत होना पड़ेगा। इतिहास गवाह है जेपी आंदोलन ने उस निरंकुश शासन की चूले हिलाकर रख दी और सत्ता से पदच्युत होना पड़ा था। सरकार को चाहिए की जनता के आक्रोश की अग्नि परीक्षा न ले, यदि यह जन आक्रोश ज्वालामुखी बनकर फटेगा तो सत्ता से जाना ही होगा। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्ता अंको का खेल होती है और सत्ता की चाबी जनमानस के हाथों में होती है व आमजन अंक पलटने में समय नहीं लगाता है। जो सामाजिक समरसता को नष्ट करने वाला कानून बनाया गया है, उसको सरकार को वापिस लेना ही होगा क्योंकि यह समाज के टुकड़े टुकड़े करने वाला कानून हैं।
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