पत्रकारिता के कुछ मापदंड होते हैं। सटीक, निष्पक्ष व तथ्यपरक पत्रकारिता के जरिये ही आमजन में पत्रकारिता पर विश्वास होता है लेकिन लोकतंत्र के इस स्तम्भ ने पत्रकारिकता के मूल्यों को ताक पर रखकर बिना तथ्यों के खबरें प्रकाशित करने को ही पत्रकारिता समझ बैठे हैं। वैसे तो पत्रकारिता के पतन की पराकाष्ठा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, जब दो हजार के नोट में नैनो चीप को लेकर बहुत बखान किया था। इसी क्रम में यूट्यूबरो के जिले में फैले जाल ने पत्रकारिकता को रसातल में धकेलने में कमी नहीं छोड़ी। उपरोक्त तथ्य व भाजपा जिला संगठन को लेकर देखें तो जिला भाजपा संगठन की गुटबाजी से शायद ही कोई अनभिज्ञ हो, अब आलम यह हो गया है कि पार्षद के चुनावों में कमल के फूल का विरोध करने वाले खुद को स्वयंभू संगठन पदाधिकारी घोषित करने में परहेज नहीं कर रहे और मजे की बात यह है कि पत्रकारो द्वारा इसे बिना तथ्यों व बिना भाजपा जिलाध्यक्ष की नियुक्ति बिना ही प्रमुखता से प्रकाशित भी कर दिया। इसी खबर को उस धड़े ने लपक लिया, जो संगठन पर सालों से कुंडली मारे बैठे थे क्योंकि वह धड़ा संगठन पर पदाधिकारियों की लिस्ट में अपना नाम आना जन्म सिद्ध अधिकार मानता रहा है। उस स्वयंभू पदाधिकारी ने जिस तरह से संगठन के पदाधिकारियों व नेताओं को इस बात को लेकर बैठक के लिए बुलाया कि नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की ताजपोशी को लेकर आतिशबाजी का आयोजन है लेकिन उसी बैठक में स्वयंभू पदाधिकारी ने घोषणा कर सभी को सकते में डाल दिया कि आखिर उनके नाम की घोषणा कब हुई थी। यह उसी गुटबाजी का जीवंत उदाहरण है, जिसको लेकर झुन्झुनू जिला विख्यात रहा है। यदि समय रहते प्रदेश नेतृत्व व जिलाध्यक्ष ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए तो आगामी पंचायत व नगर निकाय चुनावों में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना होगा।
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