जितनी लंबी सिगरेट, उतना अधिक टैक्स

AYUSH ANTIMA
By -
0




1 फ़रवरी से सिगरेट, बीड़ी और पान मसाला जैसे तंबाकू-उत्पादों पर लागू होने जा रही नई कर व्यवस्था केवल कीमत बढ़ाने का फैसला नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, राजस्व और उपभोग व्यवहार—तीनों के बीच संतुलन साधने की एक कोशिश है। सरकार ने GST मुआवजा सेस को समाप्त कर उसकी जगह नई एक्साइज ड्यूटी और सेस लागू करने का रास्ता चुना है, ताकि तंबाकू से होने वाले स्वास्थ्य-खर्च की भरपाई भी हो और कर-आधार भी स्थिर रहे।

नई संरचना के तहत सिगरेट और पान मसाला पर उच्च GST (लगभग 40%) के साथ अतिरिक्त उत्पाद शुल्क/सेस लगाया जाएगा, जबकि बीड़ी पर GST 18% बनी रहेगी। सिगरेट के मामले में एक्साइज ड्यूटी लंबाई और श्रेणी के अनुसार तय होगी—यानी जितनी लंबी/प्रीमियम सिगरेट, उतना अधिक कर। पान मसाला पर स्वास्थ्य एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सेस जोड़कर कर-भार और बढ़ाया गया है। इसका सीधा संकेत है कि नीति-निर्माता सिगरेट-पान मसाला को सिन गुड्स मानते हुए खपत घटाने की दिशा में आर्थिक अवरोध खड़ा करना चाहते हैं।
उपभोक्ता की जेब पर असर अब सबसे अहम सवाल है। उपलब्ध अनुमानों के आधार पर सिगरेट की खुदरा कीमतों में 20–30% तक बढ़ोतरी संभव है। जहाँ 10-स्टिक का पैक पहले ₹100–₹150 के बीच मिलता था, वही अब ₹120–₹180 या उससे अधिक तक जा सकता है—ब्रांड और साइज के हिसाब से फर्क पड़ेगा। बीड़ी पर कर-बोझ अपेक्षाकृत कम रहने से कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की संभावना है; छोटे पैक ₹10–₹20 से बढ़कर ₹11–₹24 के दायरे में जा सकते हैं। पान मसाला में नए सेस का असर दिखेगा—छोटे सैशे ₹10–₹20 से बढ़कर ₹11–₹25 और बड़े पैक ₹30–₹60+ तक पहुँच सकते हैं। ये आंकड़े अनुमानित हैं; अंतिम MRP कंपनियाँ तय करेंगी। बाज़ार स्तर पर यह फैसला तंबाकू कंपनियों के मार्जिन पर दबाव डालता है क्योंकि बढ़ा हुआ कर या तो कीमतों में पास-ऑन होगा या बिक्री घटेगी—अक्सर दोनों का मिश्रण दिखता है। अल्पकाल में शेयर-मूल्य और मांग पर दबाव संभव है, पर दीर्घकाल में सरकार को स्थिर राजस्व और समाज को कम खपत का लाभ मिल सकता है। नीति का स्वास्थ्य-तर्क भी स्पष्ट है—कैंसर और अन्य रोगों से जुड़े सार्वजनिक खर्च को देखते हुए उच्च जोखिम वाले उत्पादों को महंगा बनाना।
निष्कर्षतः, 1 फ़रवरी से तंबाकू-उत्पाद निश्चित रूप से महंगे होंगे। यह बढ़ोतरी केवल कर-अंकगणित नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक संकेत है—जहाँ कीमत के ज़रिये खपत पर लगाम कसने की कोशिश की जा रही है। उपभोक्ता के लिए इसका अर्थ है सीधी जेब-मार और समाज के लिए एक संदेश कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की कीमत अब उत्पाद की कीमत में दिखाई देगी।

*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!