हिरासत में मौतें: जिम्मेदार कौन*

AYUSH ANTIMA
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हिरासत में मौत की घटनाओं को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रूख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने राजस्थान में गत आठ महीनों में पुलिस हिरासत में 11 मौत हो जाने को लेकर सुनवाई करते हुए कहा कि हिरासत में हिंसा व मौत हमारे सिस्टम पर धब्बा है और इसे देश कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। माननीय कोर्ट ने पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। सुनवाई के दौरान सालिसिटर जनरल ने कहा कि हिरासत मे मौत को कोई भी व्यक्ति सही नहीं ठहरा सकता। विदित हो सर्वोच्च न्यायालय ने मानवाधिकार के हनन को रोकने को लेकर 2020 में अपने एक आदेश में पुलिस थानों, केन्द्रीय जांच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय आदि कार्यालयों में सीसीटीवी कैमरे और रिकार्डिंग उपकरण लगाने के आदेश पारित किये थे।‌ रिकार्डिंग को देखकर यह पता चलेगा कि आरोपी की हिरासत में मौत किस वजह से हुई है। 
जांच एजेंसियों का मुख्य कार्य अपराधिक आरोपियों को न्याय के कटघरे में खड़ा करना होता है न कि आरोपी को सीधे यमराज के पास भेजना होता है। ऐसे मामलों मे आरोपी से पूछताछ जांच प्रकिया का हिस्सा है लेकिन आरोपी की सुरक्षा का दायित्व भी उसी जांच एजेंसी का होता है। अब यह बात सामने आती है कि यदि जांच एजेंसियां अपने दायित्व का सही तरीके से निर्वहन कर रही है तो हिरासत मे मौत के मामले में आखिर जिम्मेदार कौन है। यह सिस्टम की लापरवाही और मनमानी का नतीजा है कि आरोपी सदा के लिए मौन हो जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आमजन जांच एजेंसियों से ज्यादा न्याय पालिका पर भरोसा करता है लेकिन हिरासत मे मौत होना कहीं न कहीं हमारी न्यायिक भावना को भी चोट पहुंचाती है। सुप्रीम कोर्ट इस बात को लेकर भी नाराज़ हुआ कि केन्द्र सरकार ने अब तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल नहीं की है। इस मामले को लेकर सुनवाई को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आगामी 16 दिसम्बर को सूचीबद्ध किया है।

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