पत्रकार झालानी ने लिखा डीजीपी को पत्र: पत्रकार सुरक्षा प्रकोष्ठ की स्थापना की जाए

AYUSH ANTIMA
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जयपुर: राजस्थान पुलिस की कार्य प्रणाली में बढ़ती अव्यवस्थाओं, जनता की उपेक्षा और थानों में व्याप्त भय के वातावरण पर कड़ा रुख अपनाते हुए वरिष्ठ पत्रकार महेश झालानी ने पुलिस महानिदेशक को एक पत्र भेजा है। पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि पुलिस तंत्र आज भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है, जहाँ नागरिक सम्मान और पारदर्शिता की जगह डर और मनमानी हावी है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि पुलिस प्रणाली को तुरंत नागरिक-मित्र नहीं बनाया गया तो पुलिस के प्रति जनता का विश्वास समाप्त हो जाएगा। पत्र में सबसे पहले थानों के बाहर पारदर्शी स्वागत कक्ष की स्थापना की माँग की गई है। झालानी ने कहा कि वर्तमान स्थिति में थाने में प्रवेश करते ही आम नागरिक भय, अपमान और असहजता का अनुभव करता है। इसे बदलना अब अनिवार्य है। स्वागत कक्ष पूरी तरह काँच का हो, सीसीटीवी से सुसज्जित हो और वहाँ शिकायतकर्ता के साथ सौजन्यपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने साफ लिखा कि “पुलिस थाने जनता की सेवा का केंद्र हैं, आतंक का अड्डा नहीं।” उन्होंने यह भी कहा कि थानों के स्वागत कक्ष में बैठने वाली महिलाएँ पुलिस विभाग से नहीं, बल्कि संविदा के आधार पर नियुक्त की जाएँ। उनकी वर्दी खाकी नहीं होनी चाहिए, ताकि नागरिकों पर अनावश्यक मानसिक दबाव न पड़े। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आज भी कई थानों में नागरिकों को केवल खाकी देखकर डराया-धमकाया जाता है। इस मानसिकता को जड़ से खत्म करना होगा। स्वागत कक्ष की महिलाएँ कॉरपोरेट की तरह प्रशिक्षित और विनम्र हों। यही मॉडल आधुनिक पुलिस का पहला कदम होना चाहिए। पत्र में एक और सवाल उठाते हुए कहा गया कि राज्य के अधिकांश थानों में आज तक एक साधारण नोटिस बोर्ड तक नहीं लगा है, जिसमें थाना प्रभारी का नाम और मोबाइल नंबर अंकित हो। वरिष्ठ पत्रकार ने इसे “पारदर्शिता की हत्या” बताते हुए माँग की कि हर थाने के बाहर बड़े अक्षरों में थाना प्रभारी, बीट अधिकारियों और थाने के अधिकृत टेलीफोन नंबर का उल्लेख अनिवार्य किया जाए। “यदि पुलिस खुद को छुपाकर रखना चाहती है, तो जनता उस पर विश्वास कैसे करेगी।” झालानी ने यह गम्भीर सवाल उठाया है। वरिष्ठ नागरिकों और पत्रकारों को थाने बुलाने की प्रथा को उन्होंने “सीधी उत्पीड़न की संस्कृति” बताया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि तीन वर्ष तक की सजा वाले मामलों में किसी वरिष्ठ नागरिक या पत्रकार को थाने बुलाना पूर्णतः बंद होना चाहिए। यदि पूछताछ आवश्यक हो तो नोटिस देकर, समय तय कर, उनके घर या तटस्थ स्थान पर ही पूछताछ हो। किसी भी अधिकारी द्वारा इस नियम का उल्लंघन सीधे शक्ति के दुरुपयोग की श्रेणी में आना चाहिए। पत्रकारों की सुरक्षा पर उन्होंने आगाह किया कि “पत्रकारों को डराकर सरकारें नहीं बचतीं, लेकिन लोकतंत्र जरूर मर जाता है।” उन्होंने राज्य में तत्काल "पत्रकार सुरक्षा प्रकोष्ठ" स्थापित करने, जिला स्तर पर डिप्टी एसपी रैंक के नोडल अधिकारी नियुक्त करने और किसी पत्रकार पर कार्रवाई से पहले डीजी कार्यालय को अनिवार्य सूचना देने की माँग रखी है। झालानी ने यह भी आरोप लगाया कि कई थानों में सीसीटीवी या तो चलता नहीं है या उसकी रिकॉर्डिंग समय रहते मिटा दी जाती है। इसे ‘पुलिस की मनमानी और बचने की कोशिश’ बताते हुए उन्होंने सभी थानों में 90 दिन की अनिवार्य रिकॉर्डिंग का प्रावधान लागू करने की माँग की। एफआईआर की स्थिति और शिकायतों की प्रगति दिखाने वाले डिजिटल बोर्ड लगाने की माँग भी जोरदार रूप से की है। पत्र में यह भी कहा गया है कि पुलिस तंत्र का व्यवहार आज भी जनसंवेदना से बहुत दूर है। “पुलिस वर्दी अहंकार का प्रतीक नहीं, जिम्मेदारी का भार है लेकिन कई जगह दूसरा ही रूप दिखाई देता है।” उन्होंने मानवाधिकार, संवाद कौशल और नागरिकों से संवेदनशील व्यवहार पर नियमित प्रशिक्षण को बाध्यकारी बनाने की माँग की है। अंत में झालानी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि राजस्थान पुलिस को वास्तव में जनहित में काम करना है, तो यह बदलाव अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता बन चुके हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जनता अब पुराने ढर्रे वाली पुलिस को सहन नहीं करेगी। पुलिस को खुद में परिवर्तन लाना होगा, अन्यथा जनता का आक्रोश बढ़ना तय है।

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