सुन्दर राम राया, परम ज्ञान परम ध्यान, परम प्राण आया।। अकल सकल अति अनूप, छाया नहिं माया। निराकार निराधार, वार पार न पाया॥ गंभीर धीर निधि शरीर, निर्गुण निरकारा। अखिल अमर परम पुरुष, निर्मल निज सारा॥ परम नूर परम तेज, परम ज्योति परकासा। परम पुंज परापरं दादू निज दासा॥ निर्गुण ब्रह्म की उपासना में जो उत्कृष्ट दशा है, उसमें ब्रह्य की जो प्रतिति होती है, उसका स्वरूप निर्देश कर रहे हैं। उस दशा में वह अति सुन्दर मालूम होता है। जो सत्तामात्र से सारे संसार को चलाने वाला सम्राट् है। सब में रमण करने के कारण उसको राम कहते हैं। सोलह कलाओं से रहित सर्वमय अति अनुपम निराकार माया और उसके कार्य से रहित निराधार है, जिसके आदि अन्त का पता नहीं चलता। वह आदि अन्त से रहित गभीर धैनिश्चि परम पुरुष तथा सब भूतों में अपने वास्तविक अमर भाव से स्थित है, जिसका तेजोमय ज्ञान स्वरूप प्रकाश सब जगह फैला हुआ है। जो मायातीत है, मैं उसी परमात्मा का दास हूं। योगवासिष्ठ में- वह सर्वव्यापी होने से सब में स्थित है एवं वास्तव में ज्ञान और ज्ञेय से रहित सच्चिदानन्द परम पद स्वरूप है। वह ही परम पद सब की पराकाष्ठा है। वही संपूर्ण दृष्टियों में सर्वोत्तम दृष्टि है। वह ही सारी महिमाओं की सर्वोत्तम महिमा है तथा वह ही गुरुओं का भी गुरु है, वही सबका आत्मा है और वही विज्ञान है, वही शून्य स्वरूप है, वही परब्रह्म है, वही कल्याण है वह ही परम शान्त शिव तथा विद्या (ज्ञान) है, वही परमस्थिति है।
3/related/default