प्रशासन की दोहरी नीति पर सवाल: करोड़ों की सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं की नजर, नियम एक तो कार्रवाई अलग क्यों

AYUSH ANTIMA
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निवाई (लालचंद सैनी): नगर पालिका क्षेत्र में प्रशासन की कार्यशैली और अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया में भेदभाव के आरोपों ने तूल पकड़ लिया है। दशहरा मैदान के पास स्थित बेशकीमती जमीनों पर कार्रवाई को लेकर स्थानीय कॉलोनाइजरों और नागरिकों में भारी असंतोष है। आरोप है कि प्रशासन चुनिंदा खसरा नंबरों पर तो सख्ती दिखा रहा है, लेकिन पास ही स्थित करोड़ों की सरकारी जमीन और अन्य अवैध कॉलोनियों पर मौन साधे बैठा है।
*​नियम एक, कार्रवाई अलग-अलग क्यों*
मामला दशहरा मैदान के पास की जमीनों का है। जानकारों के अनुसार, प्रशासन ने खसरा संख्या 4469 और 4470 पर तो तत्परता दिखाते हुए धारा 177 के तहत कार्रवाई को अंजाम दे दिया लेकिन, हैरानी की बात यह है कि पास ही स्थित खसरा संख्या 4538/2 और 4538/4, जहाँ परिस्थितियां बिल्कुल समान हैं, वहां प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। स्थानीय लोगों का सीधा सवाल है कि "जब नियम सबके लिए एक हैं, तो कार्रवाई में यह भेदभाव क्यों…"

*​सरकारी जमीन पर प्लॉटिंग की तैयारी, प्रशासन बेखबर*

स्थानीय नागरिकों ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि खसरा संख्या 4538/2 व 4538/4 के ठीक पास खसरा संख्या 4538/1 में करीब 15 बिस्वा सरकारी भूमि (सिवाय चक) मौजूद है। आरोप है कि भू-माफिया इस सरकारी जमीन को भी अपनी जागीर समझकर वहां अवैध रूप से प्लॉटिंग की तैयारी कर रहे हैं। शहर में सैकड़ों जगह कृषि भूमि ओने-पौने दामों में खरीदकर उसके साथ सटी सरकारी जमीनों को भी बेचने का खेल चल रहा है, लेकिन हल्का पटवारी से लेकर उच्च अधिकारियों तक सब चुप्पी साधे हुए हैं। लोगों का कहना है कि "दाल में कुछ काला है," तभी प्रशासन मौन है।

*​कोरे कागज पर सौदे, पट्टे का झूठा झांसा*

निवाई में अवैध कॉलोनियों का जाल तेजी से फैल रहा है, विशेषकर जगन्नाथपुरी और कृष्णा विहार जैसे इलाकों में।
*​ऊँचे दाम:* भू-माफिया 1500 से लेकर 10,000 रुपये प्रति वर्ग गज के भाव से जमीन बेच रहे हैं।
*​बिना लिखा-पढ़ी:* कई मामलों में कोरे कागज पर लिखकर लाखों रुपये ऐंठे जा रहे हैं।
*​झूठे वादे:* खरीददारों को नगर पालिका से पट्टे बनवाने का झूठा आश्वासन देकर गुमराह किया जा रहा है।
*​डरे हुए हैं खरीददार*
जिन लोगों ने इन अवैध कॉलोनियों में जीवन भर की जमा पूंजी लगाकर प्लॉट खरीदे हैं, वे अब ठगा सा महसूस कर रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर उन्होंने मुंह खोला तो उनकी दी गई राशि डूब जाएगी, इसलिए वे प्रशासन के सामने आने से कतरा रहे हैं। वहीं, भू-माफिया बेखौफ होकर भोले-भाले लोगों को विश्वासघात का शिकार बना रहे हैं।
*​सवाल जो जवाब मांगते हैं*

* ​खसरा संख्या 4538/1 की सरकारी जमीन को अब तक अतिक्रमण मुक्त क्यों नहीं कराया गया ?
* ​धारा 177 की कार्रवाई में चुनिंदा खसरा नंबरों को ही निशाना क्यों बनाया गया ?
* ​अवैध कॉलोनाइजरों के खिलाफ पटवारी और जिम्मेदार अधिकारी रिपोर्ट क्यों नहीं करते ?

​अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन कुंभकर्णी नींद से जागकर इन भू-माफियाओं पर कार्रवाई करता है या फिर शहर की बेशकीमती जमीनें ऐसे ही लुटती रहेंगी।

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