शेखावाटी के परमहंस पंडित गणेश नारायण जी के 179वे जन्म दिन पर विशेष

AYUSH ANTIMA
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शेखावाटी की धरा वीर प्रसूता, दानवीरों, भामाशाहो के नाम से विख्यात रही है लेकिन इसके साथ ही बड़े बड़े संत महात्माओं ने अपनी भक्ति के बल पर इसको पवित्र बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इसी क्रम में अघोरी बाबा, वाणी सिध्द पंडित गणेश नारायण जी का स्थान सर्वोपरि है। शेखावाटी के परमहंस के नाम से विख्यात पंडित जी का जन्म झुन्झुनू के बुगाला गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पंडित जी वेद शास्त्रों के अच्छे ज्ञाता थे। पंडित जी संवत् 1947 को चिड़ावा नगरी आते थे। उनकी तपोभूमि व साधना की भूमि चिड़ावा रही, जिसको उन्होंने शिवनगरी के नाम से विख्यात कर दिया। पंडित जी मां भगवती के अनन्य भक्त थे व दुर्गा मंत्र का जाप हर समय करते रहते थे। वे वाणी सिध्द थे, उनकी वाणी से निकली हर बात ब्रह्म वाक्य होती थी। पंडित जी अपने भक्तों को मन की बात बताकर आश्चर्यजनक कर देते थे। उन्होंने जिसको भी आशीर्वाद दिया, वह धन्य हो गया। उनको अनिष्ट या खुशी की बात का अहसास पहले ही हो जाता था। पिलानी के बिरला परिवार के मुखिया सेठ जुगल किशोर बिरला से परमहंस का विशेष स्नेह था। कहते हैं उन्हीं के वरदान से उधोग जगत में बिरला की तूती बोलती है। सेठ जुगल किशोर बिरला का मन था कि पंडित जी पिलानी रहे लेकिन उन्होंने बिरला को कहा कि "जुगलिया या चिड़ावा नगरी शिव नगरी है अं नगरी मं कोनी छोड़ूं"। खेतड़ी के राजा अजीत सिंह भी पंडित जी के परमभक्त थे, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद को अपने खर्चे पर विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए भेजा था। पंडित जी नीले वस्त्र धारण करने के साथ ही अघोरी बनकर रहते थे। मारवाड़ी के व्यंजन बड़े व सैल उनका प्रिय व्यंजन था और आज भी उसी का प्रसाद पंडित जी को अर्पित किया जाता है। पूरे भारतवर्ष में पंडित गणेश नारायण जी के करोड़ों भक्त हैं। शेखावाटी के लोग बावलिया के नाम से भी पुकारते हैं। परमहंस पंडित गणेश नारायण जी संवत् 1969 पौष मास की नवमी को योग मार्ग द्वारा यह नश्वर शरीर का त्याग किया था। इनके निर्वाण दिवस पर चिड़ावा में मेला लगता है व लाखो भक्त इस मेले में आते हैं। शेखावाटी के महान संत परमहंस पंडित गणेश नारायण जी के 179वे जन्मदिन पर आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) परिवार की तरफ से सादर वंदन।

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