वैसे तो भारतीय इलैक्ट्रिक मिडिया इस कदर रसातल में चली गई है कि शायद ही अपनी साख को प्राप्त करें। सियासत की हवेली पर मुजरा करने का एक नायाब नमूना नोटबंदी के समय देखा था, जिसने सियासत की चापलूसी की सारी हदें ही पार कर दी, जब यह दिखाया गया कि दो हजार के नोट में नैनो चीप होने का दावा किया था, जिससे जमीन मे छुपे कालेधन का आसानी से पता लगाया जा सकेगा। यह इलैक्ट्रिक मिडिया की चाटुकारिता की पराकाष्ठा थी। मृत्यु अटल सत्य है, जो इस संसार में आया है, निश्चित रूप से एक दिन उसकी मृत्यु होना स्वाभाविक है लेकिन देश के इलैक्ट्रिक मिडिया ने तो सबसे पहले सबसे तेज की प्रवृति के चलते पत्रकारिता की हदें ही पार कर दी। बालीवुड के सदाबहार ऐक्टर धर्मेंद्र की मौत की खबर बिना तथ्यों के ही प्रसारित कर दी फिर सोशल मिडिया पर श्रध्दांजली अर्पित करने वालों की बाढ आई, उसमें भाजपा नेता पीछे क्यों रहते, कहीं उनके नंबरों में कमी न आ जाए। भारत के विशाल लोकतंत्र की विश्व में मिसाल दी जाती है लेकिन उसका एक स्तंभ पत्रकारिता, अर्थ के जंग लगने से जर्जर होकर गिरने की अवस्था में है। एक समय वह भी था कि गांव की चौपाल पर लोगों का हुजूम अखबार के इंतजार में रहता था फिर उन खबरों का विश्लेषण होने के साथ इस बात का दंभ भरते थे कि यह खबर अखबार में छपी है। यह विश्वसनीयता थी भारतीय पत्रकारिता की। समय बदला, इलैक्ट्रिक मिडिया ने पैर पसारने के साथ ही यूट्यूबरो का आगमन हुआ, जिसने भारतीय पत्रकारिता को रसातल में धकेल दिया। चैनलो के एंकर सियासत के भौपू बन गये। कुछ एंकरों को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे सत्ता पक्ष राजनीतिक दल के मिडिया पैनल में कार्यरत हो। अपने शब्द सामने वाले के मुंह में ठूंसते नजर आते हैं। पूर्व सांसद व ऐक्टर धर्मेंद्र के प्रकरण में भारतीय मिडिया ने जो उनके परिवार को मानसिक रूप से आहत किया है, उसको लेकर भारतीय मिडिया का वीभत्स चेहरा उजागर हुआ है। मै अपनी और आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) परिवार की ओर से धर्मेन्द्र जी के दीर्घायु की कामना करता हूं।
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