राजस्थान के नर्सिंग कॉलेजों का हाल देखिए तो लगता है, मानो कोई “शिक्षा नहीं, उत्पादन उद्योग” चल रहा हो। नाम नर्सिंग कॉलेज, काम डिग्री की फैक्ट्री। यहां नर्सिंग स्टाफ नहीं बनता, फाइलों में छपे देवी देवता तैयार होते हैं, जो स्टेथोस्कोप को सेल्फ़ी स्टिक और थर्मामीटर को फाउंडेशन ब्रश समझकर भी पास हो जाती हैं। कहने को इन संस्थाओं में निरीक्षण हर साल होता है, मगर निरीक्षण टीमों की आंखें इतनी दानवीर हैं कि हर गड़बड़ी को देखकर भी “सब ठीक है” का आशीर्वाद दे देती हैं। जिन कॉलेजों में लैब उपकरणों से ज्यादा धूल के कण होते हैं, वे भी बड़ी सहजता से मान्यता पा जाते हैं। राजस्थान का नक्शा उठाकर किसी भी शहर पर उंगली रख दीजिए। संभावना है कि वहाँ एक न एक फर्जी नर्सिंग संस्थान अपनी धड़ल्ले से चलती दुकान के साथ मौजूद मिल जाएगा। मान्यता का तमगा कागज़ पर, अस्पताल का अटैचमेंट हवा में और छात्रों की ट्रेनिंग भगवान भरोसे। यह पूरा राज्य मानो स्वास्थ्य शिक्षा का थोक बाजार बन चुका है, जहाँ नर्स नहीं, नर्सिंग जैसी दिखने वाली डिग्रियाँ आस-पास के शहरों में ठेके पर बनकर सप्लाई होती हैं। जयपुर की बात करें तो यहाँ नर्सिंग कॉलेजों की संख्या इतनी है कि अगर सभी कॉलेजों की वास्तविक लैब और फैकल्टी जोड़ दी जाए, तो शायद एक ठीक-ठाक अस्पताल भी खड़ा न हो पाए। निरीक्षण की तारीख आते ही लैब में अचानक माइक्रोस्कोप, मॉडल और नकली मरीज प्रकट हो जाते हैं, जैसे कोई जादुई चारा डाल दिया गया हो। अगले दिन सब फिर गायब, जैसे सरकार की ईमानदारी। सीकर, झुंझुनूं बेल्ट तो नर्सिंग डिप्लोमा निर्माण का एशिया का गुड़गाँव बन गया है। गली–गली में ऐसे कॉलेज, जिनमें छात्रों की हाजिरी से अधिक कुर्सियाँ ही मौजूद नहीं। यहाँ उपस्थिति रजिस्टर में वे नाम भी मिल जाते हैं, जिन्हें शायद पासपोर्ट ऑफिस के लोग भी पहचान न पाएं। सबसे मज़ेदार हिस्सा—इन कॉलेजों में पढ़ाई से ज़्यादा चर्चा इस बात की होती है कि अगले निरीक्षण में कौनसी सेटिंग काम आएगी। कोटा तो डॉक्टर बनाने का मानो कारखाना ही बन चुका है। वह अब ख़तरा तैयार करने का पैकेज डील भी देने लगा है। छात्रों को क्लिनिकल ट्रेनिंग उन अस्पतालों में सिखाई जाती है, जहाँ भर्ती मरीजों से ज़्यादा दीवारों पर चूना उखड़ता मिलता है। कुछ कॉलेज ऐसे भी हैं, जहाँ छात्र साल भर हॉस्टल में लड़ाई कर लेते हैं, मगर अस्पताल में एक दिन की भी इंटर्नशिप बिना सेटिंग के संभव नहीं। अजमेर, नागौर जंक्शन में तो नर्सिंग शिक्षा का स्पेशल पैकेज मिलता है—“फीस दो, डिग्री लो और चिंता मत करो—इंटर्नशिप हम सेट करा देंगे।” यहाँ के कई कॉलेजों की लैब में सलाइंया तो खिलौने वाली होती है या उधार पकड़ी गई। उपकरणों का संग्रह ऐसा मानो कॉलेज नहीं, किसी लो-बजट धार्मिक आयोजन का अस्थायी मेडिकल कैंप हो।
भरतपुर, धौलपुर की तरफ बढ़ें तो वहाँ के कॉलेजों में कागज़ों पर आईसीयू, एनआई की यू, लेबर रूम, पाठ्य सामग्री सब पर ज़मीन पर जाकर देखिए तो वहीं आईसीयू की दीवार पर टंगे कैलेंडर में पिछले तीन सालों की तारीखें गवाही देती मिलती हैं कि यहाँ कुछ कभी चला ही नहीं। यहाँ की कई नर्सें ऐसी ट्रेनिंग लेकर भी निकलीं, जिन्होंने बीपी मशीन का पट्टा उल्टा बांध दिया और फिर कहा “बीपी की वेल्यू लोड नहीं हो रही।” उदयपुर, जो स्मार्ट सिटी होने का तमगा पहनता है, उसकी चमक भी इस धंधे की कालिख से बची नहीं। यहाँ के कई नर्सिंग कॉलेजों के हॉस्टल में छात्राएँ रहती कम हैं, कागज़ों में भरी रहती हैं। क्लिनिकल ट्रेनिंग का ठेका उन अस्पतालों को मिलता है, जो खुद अपनी बुनियादी सेवाओं के लिए दानदाताओं के मोहताज हैं लेकिन फाइलों में सब “अंतरराष्ट्रीय स्तर” पर चलता हुआ दिखता है और अंत में जैसलमेर– बाड़मेर बीकानेर बेल्ट जहाँ शिक्षा से पहले रेतीली हवाएँ चलती हैं पर नर्सिंग कॉलेजों का जादू ऐसा फैला कि कई संस्थान ऐसे उभरे, जिनकी इमारतें ख़ुद रेगिस्तान की तरह स्थान बदलती प्रतीत होती हैं। कभी यहाँ, कभी वहाँ, पर कागज़ों में सब दुरुस्त। फैकल्टी भी वही दो–चार लोग, जो सुबह बीकानेर में पढ़ा रहे हैं, दोपहर को जैसलमेर की उपस्थिति में दर्ज़ हो जाते हैं। यह पूरा नक्शा देखकर लगता है कि राजस्थान में नर्सिंग कॉलेज खोलना शिक्षा सेवा नहीं, बल्कि वही पुराना, लाइसेंस-राज वाला धंधा है, जहाँ काम का नहीं, कनेक्शन का मोल चलता है और अब जब सरकारें नींद से जागी हैं, तो मामला इतना बिगड़ चुका है कि सिस्टम सुधर नहीं सकता; इसे तो रीस्टार्ट करना पड़ेगा।
*सुरेन्द्र चतुर्वेदी, पत्रकार*