बिहार की राजनीति में वोट और सीटों का रिश्ता अक्सर वैसा होता है, जैसे किसी रिश्ते में प्यार बहुत हो और भरोसा बिल्कुल न बचे—ऊपरी आंकड़े चमकते हैं, पर नतीजे उलटे पड़ते हैं। ज्ञानेश कुमार की यह पहेली भी उसी विरोधाभास का ताजातरीन उदाहरण है।
*RJD को मिले 1.8 करोड़ वोट और सिर्फ़ 25 सीटें*
*BJP को मिले 96 लाख वोट और मिल गईं 91 सीटें*
*JDU को मिले 90 लाख वोट और चढ़ बैठी 83 सीटों पर*
कागज़ पर देखें तो RJD बिहार की आधी जनता की पसंद लगती है लेकिन विधानसभा में उसका प्रभाव उतना ही दिखाई देता है, जितना रात के अंधेरे में बुझी हुई लालटेन, दूसरी तरफ BJP–JDU का वोट शेयर आधा है पर सीटें दुगुनी, जैसे किसी ने वोटों में नहीं, रणनीति में निवेश किया हो। सच भी यही है। चुनाव सिर्फ़ वोटों से नहीं जीते जाते, वोट कहां पड़े, यह असली खेल है। RJD का वोट पूरे बिहार में एक समान बिखरा, हर जगह खूब वोट, पर बहुत जगह कम अंतर से हार। जीत के लिए जिस कटिंग एज वोट की जरूरत होती है, वह NDA ने सीट-दर-सीट बोतल में कैद कर रखा था। जहां लड़ना था, वहीं फोकस; जहां हल्का होना था, वहां ऊर्जा बचाकर रखी गई। महागठबंधन ने गठबंधन तो बनाया, पर ग्राउंड ट्रांसफर नहीं बना पाए। RJD सोचती रही कि उसके साथियों के वोट उसके हिस्से में आएंगे लेकिन हर सीट पर वोट धीरे-धीरे रिसते रहे—जैसे बाल्टी में छेद हो और पानी डालते ही नीचे से गिरता जाए। इसका नुकसान दोनों को हुआ, पर फायदा सिर्फ़ NDA को। उधर NDA ने सामाजिक समीकरण को भावनाओं पर नहीं, मैपिंग और माइक्रो–मैनेजमेंट पर चलाया। किस सीट पर कौन सा जातीय समूह निर्णायक है, किस बूथ पर कौन सी लहर है, किस गांव में किन लोगों को घर से निकालना है, इस पूरी मशीनरी ने कम वोट में ज्यादा सीट का चमत्कार कर दिखाया और इस बार मुकाबला दो तरफा नहीं, तीन तरफा था। तिकोनी लड़ाई हर बार सबसे बड़े वोट बेस वाले को नुकसान पहुंचाती है और NDA इसे अच्छी तरह समझता है। RJD जहां मजबूत थी, वहां JDU और BJP बारी-बारी से काट बनकर उपस्थित थे परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही लक्ष्य के साथ: RJD को रोकना। इसलिए इस चुनाव में वोटों का सागर RJD को मिला पर सीटों का सोना NDA को। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि बिहार के राजनीतिक भूगोल और रणनीतिक समझ का निर्मम प्रमाण है। RJD ने जनता का समर्थन जरूर पाया, लेकिन सीटों का विज्ञान नहीं समझा। वहीं NDA ने जनता कम पाई, पर चुनावी इंजीनियरिंग का ऐसा प्रयोग कर दिखाया कि कम वोट में भी सत्ता की कुर्सी पर आराम से बैठ गई।
आख़िर में यही साबित हुआ कि भारतीय लोकतंत्र में वोटों का बहुमत नहीं, वोटों का वितरण सत्ता तय करता है और बिहार की राजनीति इस बार फिर वही पुराना संदेश दोहराकर चली गई कि जिसने रणनीति समझी, वही जीता। जिसने भावनाओं पर भरोसा किया, वह सीटों में हार गया।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*