सरकारी अकर्मण्यता पर आंसू बहाता खेतड़ी कापर काम्प्लेक्स

AYUSH ANTIMA
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झुंझुनूं जिले की शान कहलाने वाली खेतड़ी कापर काम्प्लेक्स (केसीसी) सन 2008 से बंद पड़ा है। इस प्रोजेक्ट की वजह से खेतडी और आसपास के क्षेत्र में रौनक हुआ करती थी, आज वही क्षेत्र वीरान दिखाई दे रहा है। झुंझुनूं का एकमात्र सरकारी उपक्रम, जिसने हजारों युवाओं को रोजगार दे रखा था, सरकारी नितियों व अफसरशाही की चपेट में आने से बंद हो चुका है। यही वह सरकारी नीति थी, जो 1975 में भारत को तांबे के रूप में आत्मनिर्भर बनाने वाले इस प्रोजेक्ट को बंद करने की ओर ले गई। समय के साथ बदलाव होना जरूरी होता है और जो समय के साथ नहीं चलता, उसकी केसीसी जैसी दशा निश्चित होती है। समय के साथ मशीनरी में बदलाव न करना व आधुनिक तकनीक से युक्त मशीनरी का उपयोग न करने के कारण संचालन महंगा और अक्षम हो गया। इसके साथ ही प्लांट को पानी की पर्याप्त आपूर्ति, विशेष रूप से चंवरा और कुंभाराम लिफ्ट परियोजना से अवैध छिजत और अपर्याप्त पानी की आपूर्ति के चलते समेलटर व रिफाइनरी जैसे प्लांट बंद हो गए। केसीसी के हालात ऐसे हो गये कि उसके बंद होने के साथ ही दस हजार के करीब रोजगार देने वाला संयंत्र मात्र 500 तक सिमटकर रह गया। पहाड़ों में तांबे की चमक अब वीरानगी में तब्दील हो गई। कभी कोलिहान से केसीसी प्लांट तक रोपवे पर तांबे के पत्थरों से भरी ट्रोलियां दौड़ती थी, अब इतिहास की बात हो गई। डाबला व सिंघाना तक रेलवे लाइन पर खनिज का परिवहन होता था, रसूखदार लोगों ने पटरियां उखाड़ने के साथ ही जमीन पर कब्जा कर लिया। इस दुर्दशा को लेकर विशेषज्ञो का मत है कि यदि सरकार व एचसीएल प्रबंधन एक ठोस रणनीति बनाएं तो आसपास के औधोगिक क्षेत्र बबाई और सिंघाना रीको में तांबे पर आधारित नये उद्योग लगने की काफी संभावनाएं हैं। 2008 तक खेतड़ी में 99.99 प्रतिशत शुद्ध तांबे का उत्पादन होता था। केसीसी के पांच में से तीन प्लांट बंद हो चुके हैं। उपरोक्त तथ्यों का अवलोकन करें तो निश्चित रूप से इस संयंत्र को बदहाली की अवस्था में लाने में सरकारी नितियों का विशेष योगदान रहा है। यदि झुंझुनूं जिले के राजनीतिक कद की बात करें तो जिले के कांग्रेस के एक कद्दावर नेता स्वर्गीय शीशराम ओला 2004 से 2009 तक केन्द्र में खान मंत्री थे, इसके साथ ही श्रमिकों से संबंधित श्रम व रोजगार मंत्रालय का कार्यभार भी संभाल चुके थे। यदि ओला की राजनीतिक दृढ़ शक्ति व जिले के विकास को लेकर दूरगामी सोच होती तो उन्हीं के कार्यकाल में यह संयंत्र बंद नहीं होता। देखा जाए तो शीशराम ओला ने केवल वोटो की राजनीति की व झुंझुनूं जिले के आवाम को यमुना नहर के मुद्दे में भटकाए रखा। पर्याप्त पानी की आपूर्ति को लेकर यह संस्थान बंद हुआ तो तत्कालीन खान मंत्री रहते हुए उन्होंने इसको लेकर प्रयास क्यों नहीं किए। अफसरशाही को भी इसको बंद होने में दोषी ठहराया जा रहा है लेकिन अफसरशाही व सियासत का चोली दामन का साथ रहा है। अफसरशाही बिना सियासत के कवच बिना कोई भी ग़लत काम करने की हिम्मत नहीं कर सकती। यदि इस संयंत्र के बंद होने में अफसरशाही द्वारा भ्रष्टाचार को जिम्मेदार ठहराया जाता है तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार व खान मंत्री पर भी इसकी आंच जरुर आयेगी। डबल इंजन सरकार के गठन के बाद स्थानीय विधायकों व नेताओं द्वारा विकास की बहुत बड़ी बड़ी बाते सुनने को मिलती है लेकिन सही मायने में यदि विकास कहा जाए तो वह केसीसी संयंत्र का संचालन है, जिससे हजारों घरों के चूल्हे में रौनक आ सकती है। यदि डबल इंजन सरकार इस संयंत्र के बारे में गंभीरता से सोचने के साथ ही आधुनिक तकनीक से युक्त उपकरण व पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करें तो इस क्षेत्र में तांबे का अथाह भंडार है, इससे देश तांबे को लेकर आत्मनिर्भर तो बनेगा ही साथ में जिले में विकास के नये पंख लग सकते हैं।

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