धर्मेन्द्र की अफवाह और मीडिया की साख

AYUSH ANTIMA
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धर्मेन्द्र के निधन की खबर ने एक बार फिर मीडिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है। सोमवार को भारतीय सिनेमा के इस महानायक के निधन की झूठी सूचना सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गई। कुछ ही मिनटों में यह अफवाह ब्रेकिंग न्यूज़ बन गई और देशभर में श्रद्धांजलि संदेशों की बाढ़ आ गई। लाखों प्रशंसक स्तब्ध रह गए। कई समाचार वेबसाइटों और यूट्यूब चैनलों ने बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के यह खबर चला दी। अफसोस की बात यह रही कि कुछ मुख्यधारा मीडिया संस्थान भी इस जाल में फंस गए। इस बीच, देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) पर धर्मेन्द्र को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा कि धर्मेन्द्र जी का निधन भारतीय सिनेमा के एक युग का अंत है। उनके इस ट्वीट के बाद यह झूठी खबर और अधिक विश्वसनीय लगने लगी, और अनेक प्रमुख हस्तियों ने भी श्रद्धांजलि संदेश साझा कर दिए लेकिन लगभग एक घंटे बाद धर्मेन्द्र के परिवार और करीबी सूत्रों ने स्पष्ट किया कि यह खबर पूरी तरह झूंठी है और अभिनेता स्वस्थ हैं। इसके बाद राजनाथ सिंह ने अपना ट्वीट हटा दिया।
यह घटना न केवल सोशल मीडिया की संवेदनहीनता को उजागर करती है, बल्कि मीडिया के उस भाग की भी पोल खोलती है जो बिना जांच-पड़ताल के खबरों को ब्रेकिंग बना देता है। पत्रकारिता का मूल सिद्धांत हमेशा यही रहा है कि पहले सत्यापन, फिर प्रसारण, परंतु आज की दौड़ में यह सिद्धांत पीछे छूटता जा रहा है। धर्मेन्द्र जैसे जीवित किंवदंती के बारे में इस प्रकार की झूठी खबरें न केवल गैर-जिम्मेदाराना हैं, बल्कि नैतिकता और मानवता दोनों के विरुद्ध हैं। इस तरह की घटनाएं जनता के मन में मीडिया के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं। जब सच और झूठ का अंतर मिटने लगे, तब सूचना का मूल्य समाप्त हो जाता है। धर्मेन्द्र के बारे में फैली यह अफवाह पत्रकारिता के आत्मचिंतन की मांग करती है। समाचार संस्थानों को फिर से अपने भीतर सत्यापन की संस्कृति को स्थापित करना होगा। साथ ही, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी फेक न्यूज पर रोक लगाने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। धर्मेन्द्र आज भी हमारे बीच हैं—सशक्त, ऊर्जावान और भारतीय सिनेमा की जीवित विरासत लेकिन इस घटना ने साफ कर दिया है कि अगर झूंठ बोलने की सजा केवल पोस्ट हटाना रह गई है, तो सच्चाई की कीमत बहुत भारी पड़ सकती है। मीडिया को यह याद रखना होगा कि विश्वसनीयता खोने के बाद खबरें नहीं बचतीं, केवल अफवाहें बचती हैं।
मुझे भी जीवित को श्रद्धांजलि प्रकट करने का खेद है।

*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*

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