अगर भारतीय जनता पार्टी होशियार है तो नीतीश कुमार डेढ़ होशियार। अगर भाजपा के नेता सयाने हैं तो नीतीश कुमार भी महासयाने। बिहार में भाजपा के मन से ना चाहते हुए भी वो ही मुख्यमंत्री बनेंगे। वह कल दसवीं बार सीएम पद की शपथ लेंगे। नीतीश ने भाजपा की सारी रणनीति को पलट दिया, जिसके तहत भाजपा का इरादा इस बार पहली बार बिहार में खुद का मुख्यमंत्री बनाने का था। चुनाव के दौरान और परिणाम के बाद भी भाजपा नेताओं ने कभी भी नीतीश कुमार को फिर सीएम बनाने की घोषणा नहीं की। बिहार चुनाव में एनडीए को भारी बहुमत के चाणक्य कहे जा रहे गृहमंत्री अमित शाह ने भी नीतीश को सीएम बनाने के सवाल पर यही कहा था कि परिणाम के बाद विधायक दल की बैठक में इसका फैसला होगा। फिर एक चुनाव सभा में कहा था कि देश में प्रधानमंत्री और बिहार में सीएम की कुर्सी अभी खाली नहीं है। नीतीश कुमार शायद तभी बीजेपी की नीयत को भांप गए थे। उसके बाद जब परिणामों में बीजेपी को बिहार में जेडीयू से ज्यादा सीटें मिली तो उन्हें यह खतरा ज्यादा लगने लगा। इसीलिए उन्होंने राज्यपाल से 2 दिन पहले जब मुलाकात की तो 19 नवंबर को विधानसभा भंग करने की सिफारिश तो कर दी लेकिन खुद इस्तीफा देकर नहीं आए। जबकि अब तक की परंपरा रही है कि जिस राज्य में किसी दल या गठबंधन को बहुमत मिलता है, तो उसका नेता राज्यपाल को विधानसभा भंग करने के लिए सिफारिश कर अपना इस्तीफा देता है और राजपाल नई विधानसभा के गठन तक उसे कार्यवाहक सीएम बने रहने के लिए कहते हैं। नीतीश को लगा हो कि अगर उन्होंने इस्तीफा दे दिया तो भाजपा उनके साथ खेला कर सकती है। इसलिए अब वो जब राज्यपाल को इस्तीफा सौंपने जाएंगे तो एक हाथ से इस्तीफा देंगे और दूसरे हाथ से सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। दरअसल, अगर भाजपा चाहे तो बिना नीतीश के भी बिहार में सरकार बना सकती है। उसके खुद के 89 विधायक है। उसके सहयोगी चिराग पासवान की एलजेपीआर के 19, मांझी की हम के पांच और कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा के चार विधायक हैं। ये सभी मिलकर 117 होते हैं। यानी बहुमत से महज पांच कम। इन चंद विधायकों का इंतजाम करना भाजपा के बाएं हाथ का खेल है क्योंकि बसपा सहित तीन छोटी पार्टियों के एक-एक और कांग्रेस को 6 सीटें मिली है। जिस तरह देश भर में कांग्रेस में टूट चल रही है, बिहार में भी उन्हें तोड़ना भाजपा के लिए मुश्किल नहीं है लेकिन शायद दो कारण, भाजपा को नीतीश को फिर मुख्यमंत्री बनाने के लिए मजबूर कर रहे। पहला- केंद्र में उसकी सरकार नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नायडू की तेलुगु देशम के समर्थन से चल रही है और दूसरी बिहार में पलटूराम के नाम से जाने जाने वाले नीतीश कुमार भाजपा को छिटककर खुद उन्हें सीएम नहीं बनाने पर राजद और कांग्रेस सहित बाकी दलों के साथ मिलकर सरकार ना बना ले, जो जैसा कि वह पहले भी दो बार कर चुके हैं। एक बार भाजपा के साथ और एक बार राजद और कांग्रेस के साथ। हालांकि नीतीश फिर मुख्यमंत्री तो बन जाएंगे लेकिन इस बार भाजपा ने बिहार में बड़ी सफलता हासिल की है। वह पांच साल तक उन्हें इस पद पर सलामत रहने देगी, इसमें संदेह है। दो दिन पहले ये खबर भी आई थी कि भाजपा सीएम पद ढाई साल खुद के लिए चाहती है। शायद उसके बाद ही नीतीश कुमार ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा नहीं सौंपा था। भले ही नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बन रहे हो लेकिन जितनी साफ तस्वीर बिहार में दिख रही है, भविष्य में उतनी आसान रहेगी नहीं। महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना और एनसीपी के साथ जो खेल किया है, वैसा खतरा नीतीश पर भी मंडराता रहेगा। वैसे 10 बार मुख्यमंत्री बनने का मतलब किसी नेता के लिए 50 साल का कार्यकाल होता है लेकिन नीतीश महज 22 साल के कार्यकाल में ही 10वीं बार सीएम बन रहे हैं।
*@ ओम माथुर, वरिष्ठ पत्रकार*