प्रदेश कांग्रेस में लंबे समय से संगठनात्मक नियुक्तियों पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन हाल में उठी यह चर्चा कि क्या प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने जिलाध्यक्षों के पद “बेच” दिए। राजनीतिक गलियारों में नया ताप लेकर आई है। यह आरोप भले ही प्रत्यक्ष प्रमाणों के बिना हों पर पार्टी के भीतर बढ़ती खींचतान और असंतोष ने इन सवालों को हवा देने का काम जरूर किया है। डोटासरा की नेतृत्व-शैली हमेशा से आक्रामक, केंद्रीकृत और नियंत्रणकारी मानी जाती रही है। उनकी पकड़ संगठन पर मजबूत है और यही कारण है कि नियुक्तियों को लेकर उनके फैसले अक्सर विवादों में घिर जाते हैं। पार्टी के भीतर कई नेता मानते हैं कि जिला अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पदों का चयन योग्यता, संगठनात्मक योगदान और क्षेत्रीय सामंजस्य के आधार पर होना चाहिए लेकिन अगर नियुक्तियों में समर्थन या संधि की भूमिका अधिक दिखने लगे, तो स्वाभाविक है कि सवाल उठेंगे।
राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखा जाए तो राजस्थान कांग्रेस इस समय दो धड़ों गहलोत और पायलट के बीच महीन लेकिन स्थायी टकराव से गुजर रही है। ऐसे समय में जिला अध्यक्षों की नियुक्ति सिर्फ संगठनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि शक्ति-प्रबंधन का उपकरण बन जाती है। यही वजह है कि हर नियुक्ति को लेकर दोनों धड़ों की नजरें लगी रहती हैं और किसी एक तरफ का झुकाव तुरंत संदिग्ध या स्वार्थ प्रेरित करार दे दिया जाता है। फिर भी, यह आरोप कि पद बेचे गए लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए अत्यंत गंभीर है। यदि यह सिर्फ राजनीतिक नैरेटिव है, तो संगठन को पारदर्शिता दिखाकर इसे साफ़ करना चाहिए। और अगर कहीं आंतरिक आवाजें वाकई इस ओर संकेत कर रही हैं, तो पार्टी को आत्मसमीक्षा करनी चाहिए क्योंकि पदों का व्यापारीकरण किसी भी राजनीतिक दल की नैतिक नींव को खोखला कर देता है। राजनीति में आरोप लगाने आसान हैं पर संगठन चलाना कठिन। डोटासरा के लिए भी यह एक परीक्षा है कि वे इन आरोपों को विश्वास में बदलें—वरना यह मुद्दा उनकी कार्यशैली पर स्थायी प्रश्नचिह्न बन जाएगा।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*