राजस्थान में जब से डबल इंजन सरकार का गठन हुआ है, भाजपा के विधायक दबी जुबान में यह कहते हुए सुने गये कि सत्ता पक्ष के विधायक होने के बावजूद उनकी कोई सुनवाई नहीं होती। इसको लेकर आयुष अंतिमा (हिन्दी समाचार पत्र) ने भी अपने लेखों मे सरकार पर नौकरशाही हावी होने का अंदेशा जताया था लेकिन राजनीति एक ऐसी कला है कि जो दिखता है, वह नहीं होता और जो नहीं दिखाई देता है वह हो जाता है। राजनीति की इसी कला की चपेट में राजस्थान के मुख्य सचिव सुधांश पंत आ गये कि उनके केन्द्र में प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी हो गये। पिछले दिनो मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दिल्ली में बैठक को लेकर राजनीतिक विश्लेषक कयास लगा रहे थे कि राजस्थान में कुछ बड़ा उलटफेर होने वाला है। शायद भजन लाल शर्मा व नरेन्द्र मोदी की बैठक में ही सुधांश पंत की विदाई की पटकथा पर मुहर लग गई थी। भजनलाल शर्मा सरकार पर विपक्षी कांग्रेस पार्टी भी हमलावर रही है कि सरकार मुख्यमंत्री नहीं मुख्य सचिव चला रहे हैं। जयपुर में मुख्य सचिव के क्रिया कलापों को देखकर भी ऐसा लगता था कि सुधांश पंत ही राजस्थान के सर्वेसर्वा है। यह बात बहुत बार सार्वजनिक समारोहो में भी देखने को मिली कि सुधांश पंत ही सरकार के मुखिया हैं। उनकी इसी बात के खौफ में आईएएस व आरएएस स्तर के अधिकारी भी अपनी मनचाही पोस्टिंग को लेकर मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के बजाय मुख्य सचिव के यहां लाईन लगाए नजर आते थे। यहां तक बहुत से विधायको को मुख्य सचिव के कमरे के बाहर खड़े देखा जाना इस बात का संकेत था कि मुख्य सचिव राजस्थान सरकार में मुख्यमंत्री से भी ज्यादा प्रभावशाली है। मुख्य सचिव की कार्यशैली को लेकर सरकार के मंत्री व विधायक भी इस बात को लेकर दुखी थे कि उनकी सरकार होने के बावजूद उनके काम नहीं हो रहे। यह बदलाव तब देखने को मिला है, जब भजन लाल शर्मा सरकार अपने कार्यकाल की दूसरी वर्षगांठ मनाने जा रही है। वैसे यदि देखा जाए तो भजन लाल शर्मा सरकार के दो वर्षों को कोई विशेष उपलब्धि वाला नहीं कहा जा सकता है। समय समय पर काबीना मंत्री डॉ.किरोड़ीलाल मीणा सरकारी सिस्टम को चैलेंज करते नजर आते हैं। इसआई भर्ती को रद्द होने को लेकर भी सरकार दो खेमों में बंटी नजर आई। आरपीएससी की सदस्या संगीता आर्य का इस्तीफा न देना भी सरकार की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है जबकि कवि कुमार विश्वास की पत्नी मंजु शर्मा ने इस्तीफा दे दिया है।
कुल मिलाकर उपरोक्त प्रकरण सुपर सीएम की विदाई होना इस बात का संकेत है कि राजनीति में कोई स्थायी नहीं है।