क्या श्रीनिवास गेस्ट आर्टिस्ट साबित होंगे: जंग खा चुका है प्रदेश का प्रशासनिक ढांचा

AYUSH ANTIMA
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राजस्थान के नए मुख्य सचिव वी.श्रीनिवास का आगमन हो चुका है, लेकिन सवाल यही है कि क्या वे इस बदबूदार, सड़ा हुआ, भीतर तक खोखला हो चुका प्रशासनिक ढांचा हिला भी पाएँगे ? यह ढांचा अब ऊँट की चाल भी नहीं, शवयात्रा की चाल से चलता है। इतने सालों की सेटिंग, समर्पण, जी-हजूरी और ऊपर से नीचे तक पसरी लूट–तंत्र ने ब्यूरोक्रेसी को ऐसा बर्बाद कर दिया है कि अब योग्यता की बात करना भी हास्यास्पद लगता है। यहाँ काम करने वाले नहीं, “हाँ-में-हाँ मिलाने वाले” अफसरों की माँग है। जो जितना झुक सके, उतना ऊँचा उठता है। ऐसे में श्रीनिवास का ईमानदार, साफ-सुथरा लेकिन कम बोल्ड व्यक्तित्व बड़ी विडंबना पैदा करता है। सच तो यह है कि वे कई साल से राजस्थान से इतने दूर रहे हैं कि उनका लौटना अपने ही घर में मेहमान की तरह प्रवेश करने जैसा है। उन्हें यह भी नहीं मालूम कि कौन अधिकारी वाकई काबिल है, कौन ‘सरकारी मुनाफे’ के हथकंडों में उस्ताद है। यह अज्ञानता शुरुआत में तो मासूम लग सकती है, लेकिन कुछ ही समय में यह उनके लिए जाल भी बन सकती है। राजस्थान की नौकरशाही में अनजान रहना कभी-कभी पद की सुरक्षा भी है और जोखिम भी। यदि श्रीनिवास ने चुपचाप काम किया, फाइलों की धूल झाड़ी और सिस्टम को उसके हाल पर छोड़ दिया तो उनका कार्यकाल गुलाब की तरह शांत गुज़र जाएगा लेकिन जरा भी कठोरता दिखाई, किसी मज़बूत गुट की पूँछ पर पैर रख दिया अथवा किसी चिर-स्थाई भ्रष्ट नेटवर्क पर हाथ डाल दिया तो उनका अंत भी सुधांश पंत जैसा अचानक, खामोश और बिना शोर के हो सकता है। राजस्थान में यह किस्सा नया नहीं, परंपरा का हिस्सा है। और प्रशासन की हालत तो पूछिए मत। कई अफसर महीनों से एपीओ की कुर्सी पर जाले बुन रहे हैं। दूसरी तरफ कुछ अधिकारी ऐसे हैं, जिनके पास दो–दो, तीन–तीन विभागों का जिम्मा है। जैसे कोई सरकारी बहादुरी का तमगा हो। वित्त विभाग का तो अब सघन चिकित्सा इकाई में भर्ती होना चाहिए। चिकित्सा विभाग में राजनीतिक इंजेक्शन इतने लग चुके हैं कि असली दवाओं का असर ही खत्म हो गया है और जेडीए की सतर्कता शाखा, उसका नाम ‘सतर्कता’ है, पर काम ‘कलेक्शन’ का। ऐसा लगता है जैसे सरकार ने वहाँ किसी संगठित गिरोह को लाइसेंस पर बैठा दिया हो।
ऐसे माहौल में श्रीनिवास यदि सचमुच अपनी छाप छोड़ना चाहते हैं तो उन्हें एक ही रास्ता चुनना होगा—निर्भीक फैसले, स्वतंत्र कामकाज और फाइलों के पीछे छिपे गठबंधनों की परतें उधेड़ना। सीएमओ से तालमेल ज़रूरी है, लेकिन ‘तालमेल’ और ‘समर्पण’ के बीच दूरी उतनी ही है, जितनी लोकतंत्र और दरबारी संस्कृति में। अगर वे इस दूरी को नहीं समझ पाए और सत्ता के आगे घुटने टेक दिए, तो राजस्थान को बचाने की उम्मीद खत्म मानिए। श्रीनिवास ईमानदार हैं, काबिल हैं—पर यह भी उतना ही सच है कि वे बोल्ड अफसरों की श्रेणी में नहीं आते। राजस्थान की मौजूदा नौकरशाही आग है। जहाँ बिना बोल्डनेस के उतरना, पेट्रोल से भीगी माचिस हाथ में लेकर चलने जैसा है। उसमें रोशनी से ज्यादा, जलने का खतरा होता है। ऐसे में श्रीनिवास को यह नही भूलना चाहिए कि उनके आसपास और इर्दगिर्द सांप-कंछले डंक मारने को बेताब है।

*महेश झालानी, वरिष्ठ पत्रकार*

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