राजस्थान हाईकोर्ट ने पंचायत-निकाय चुनावों पर ऐसा फैसला सुनाया है, मानो वर्षों से राजनीति के मैदान में खड़े टालमटोल-पुराण को अचानक से पानी में बहा दिया हो। सरकार कभी परिसीमन का झंडा लेकर दौड़ती थी, कभी पुनर्गठन की लाठी लेकर लेकिन कोर्ट ने साफ कह दिया कि बहाने अब बंद, 31 दिसंबर तक सीमाएँ तय करो और 15 अप्रैल तक चुनाव करवाओ। मानो अदालत ने सीधे कह दिया हो, लोकतंत्र है साहब, आपकी सरकारी डायरियाँ नहीं कि तारीखें बदलती रहें। राजस्थान की राजनीति में यह फैसला ऐसे आया है, जैसे किसी लंबी नींद में सोए राजनीतिक वर्ग के कान में अलार्म बज गया हो। अब सरकार भी समझ गई कि निकाय चुनावों को बाद में देखेंगे वाली फाइल में डालने के दिन खत्म हुए। प्रशासक राज का जो लंबा ट्रैक रिकॉर्ड बन रहा था, वह भी कोर्ट की एक ही टिप्पणी में पिघल गया।
*चुने हुए प्रतिनिधि ही जनता की आवाज हैं*
अब यह बात राजनीतिक गलियारों में घूम रही है कि अदालत ने असल में लोकतंत्र को नहीं, नेताओं को याद दिलाया है कि जनता अभी भी जिंदा है। सरकार ने कोर्ट में वन-स्टेट-वन-इलेक्शन का राग भी छेड़ा। अदालत ने भी शायद सोचा होगा कि चलो, यह राग सिर्फ गाने के लिए नहीं, अब बजाने का समय भी आ गया है तो 15 अप्रैल की तारीख ऐसी पक्की कर दी, जैसे बच्चे की प्रगति पुस्तिका में लाल स्याही से तैराकी की अंतिम तिथि लिखी जाती है—ना तो आगे बढ़ेगी, ना पीछे। राजनीतिक जानकार अंदर ही अंदर मुस्कुरा रहे हैं क्योंकि अब पंचायत से लेकर नगर पालिकाओं तक, पूरा राज्य एक साथ चुनावी भट्टी में तपेगा और यह तपना किसी एक पार्टी के लिए नहीं, सबके लिए बराबर दर्दनाक होगा। गुटबाज़ी से घायल दल, टिकट के लिए लड़ते कार्यकर्ता, आपस में ही लड़ते नेतृत्व—अब सबको एक साथ मैदान में उतरना होगा। विपक्ष अब कह रहा है कि सरकार चुनाव नहीं करवा रही थी क्योंकि जनता की नब्ज़ बिगड़ गई थी। कोर्ट के आदेश से विपक्ष ऐसे खुश है जैसे किसी को बिना पढ़े परीक्षा में पास होने की खबर मिल जाए। वहीं सत्ता पक्ष की हालत उस छात्र जैसी है, जिसने पूरे साल किताबें नहीं खोलीं और अब प्रिंसिपल ने कह दिया कि कल परीक्षा है। संगठन को मजबूत करने का जो असीमित समय मिला हुआ था, वह अब काउंटडाउन मोड में बदल गया है। पंचायत स्तर पर होने वाले गुटीय दंगल से लेकर नगर पालिका में नेता-कार्यकर्ता वादे-वादे में भिड़ने वाले हैं।
सबसे मज़ेदार बात यह है कि कई निकायों में महीनों से प्रशासक सिंहासन पर बैठे थे। आम जनता सोच रही थी कि शायद अब यही स्थायी सरकार है लेकिन कोर्ट ने एक आदेश में बता दिया—भाई साहब, निकायों में रियासत नहीं, लोकतंत्र चलता है। प्रशासक हो या नेता—कुर्सी पर बैठने का असली अधिकार जनता देती है, विभाग नहीं।
राजनीतिक अर्थ साफ है—अब कोई दल चुनाव से भाग नहीं सकता, कोई सरकार परिसीमन-पुनर्गठन की आड़ में समय नहीं खींच सकती और कोई नेता यह बहाना नहीं मार सकता कि संगठन तैयार नहीं था। अब सब तैयार होंगे—चाहे मन से हों या कोर्ट की डांट से।
संक्षेप में कहें तो हाईकोर्ट का फैसला राजस्थान की राजनीति के लिए एक बड़ा व्यंग्यात्मक आईना है। जिसमें राजनीति अपनी वही पुरानी तस्वीर देख रही है—चुनाव टालने की कला और अदालत उसी पर लाल निशान लगा रही है। अब 15 अप्रैल तक का चुनावी रण सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, राजनीतिक दलों के लिए असली परीक्षा है।
कौन जनता की अदालत में पास होगा और कौन परिसीमन की फाइलों में फेल, यह आने वाला समय बताएगा।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*