राज्यों में नई सरकारों के शपथ ग्रहण समारोह में क्या करोड़ों रुपए की बर्बादी करना जरूरी है। महज कुछ घंटों के ये समारोह क्या राजभवन में आयोजित नहीं किए जा सकते। क्या ये जरूरी है कि इन समारोह में उसी दल या गठबंधन की अन्य राज्यों में सरकार चला रहे मुख्यमंत्री भी शामिल हो। आखिर क्यों जनता के टैक्स के धन को पानी की तरह बहाया जाता है। पिछले कुछ समय से यह रिवाज बन गया है कि जिस दल या गठबंधन की सरकार किसी राज्य में बनती है, तो सरकार का भव्य शपथ ग्रहण समारोह सार्वजनिक स्थानों पर होता है। बड़े-बड़े मैदानों में इनको आयोजित किया जाता हैं। ऐसे कार्यक्रमों में उस दल या गठबंधन की अन्य राज्यों में चल रही सरकारों के मुखिया यानी मुख्यमंत्री और मंत्री भी शामिल होते हैं। दिल्ली से भी बड़े-बड़े नेता भाग लेने जाते हैं। जैसे कल बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने पटना के सबसे बड़े गांधी मैदान में शपथ ली। इसमें एनडीए गठबंधन और भाजपा की सरकारों वाले 13 राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह सहित करीब एक दर्जन केंद्रीय मंत्री भी पटना पहुंचे। समारोह की तैयारियों पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए और इन अतिविशिष्ट नेताओं के दिल्ली और अपने-अपने राज्यों से विशेष या सरकारी हवाई जहाजों से पटना पहुंचने पर भी करोड़ों रुपए खर्च हुए होंगे। फिर इनकी सुरक्षा के लिए उस दिन राज्य भर से पुलिस और अन्य एजेंसियों के अधिकारियो को भी झोंक दिया जाता है। साथ ही प्रशासन केबड़े अधिकारी भी तैयारी में लगे रहते हैं और इस दौरान सरकारी कामकाज ठप रहता है। अब यह सार्वजनिक दिखावा बन गया है और इसमें कोई राजनीतिक दल पीछे नहीं है। चाहे वह क्षेत्रीय दल हो या फिर सबसे ज्यादा राज्यों में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन और भाजपा या फिर कुछ राज्यों में सिमट गई कांग्रेस। जब भी इनमें से किसी को किसी राज्य में सरकार बनाने का मौका मिलता है, इसी तरह सार्वजनिक शपथ ग्रहण कार्यक्रम करके करोड़ों रुपए फूंक दिए जाते हैं। कुछ साल पहले तक शपथ ग्रहण समारोह आमतौर पर राजभवनों में ही होते थे और बहुत सीमित संख्या में नेता इसमें भाग लेते थे।
इस तरह के सार्वजनिक समारोह के लिए आमतौर पर यह तर्क दिया जाता है, इसके जरिए राजनीतिक दल या गठबंधन अपनी ताकत और एकता का प्रदर्शन करते हैं लेकिन सवाल ये है कि उनकी सरकार तभी तो बनी है, जब चुनाव में उनमें एकता थी। जनता ने भी उनकी ताकत पहचान कर ही वोट और समथन दिया। फिर करोड़ों रूपए खर्च कर ऐसे प्रदर्शनों की क्या जरूरत है, आखिर बोझ तो सरकारी खजाने पर ही पड़ता है। उस खजाने पर जो आम जनता और मेहनतकश टैक्स से भरते हैं। इसमें ना किसी राजनीतिक दल का पैसा लगता है और ना ही किसी नेता का। तो फिर वो चिंता क्यों करें। क्या ही अच्छा होता कोई राज्य या दल यह मिसाल कायम करता कि उसकी सरकार बनने पर वह सादगी से शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करेगा और इसमें खर्च होने वाले पैसों का अपव्यय नहीं होगा। इस तरह के कार्यक्रमों में महज कुछ क्षण हाथों में रहने वाले गुलदस्तों और ओढाए जाने वाले शॉल पर ही हजारों रुपए खर्च हो जाते हैं। राजनीति भी अब फिल्मी दुनिया की तरह दिखावे और प्रचार की दुनिया हो गई है। जहां करो कम, दिखाओ ज्यादा वाला चलन बढ़ रहा है। आखिर राजनीतिज्ञ लोकतंत्र के राजा ही तो है और मतदाता उनकी प्रजा।
*@ ओम माथुर, वरिष्ठ पत्रकार*