झुंझुनूं में गौशालाओं के प्रबंधन को लेकर यह कहावत फिट बैठती है कि एक तरफ वह भाग्यशाली गौवंश है, जिसे छप्पन भोग खिलाया जाता है तो दूसरी तरफ वह लाचार व बेसहारा गौवंश जो तूड़ी के लिए तरस रही है। झुन्झुनू जिला कलेक्टर ने अपने एक आदेश में स्थानीय नगर पालिका प्रशासन को पाबंद किया था कि इन बेसहारा और लाचार गौवंश को गौशाला में भिजवाए लेकिन इस आदेश की धज्जियां उड़ाते नजर आ रहे हैं गौशाला प्रबंधक। सूत्रों की मानें तो चिड़ावा गौशाला में करीब 25 गौवंश को नगर पालिका प्रशासन ने गौशाला में छोड़ा था लेकिन एक न्यूज चैनल की पड़ताल में वहां 6 गौवंश ही मिले। इसको लेकर गौशाला प्रबंधक से बात की गई तो उन्होंने अनभिज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि रात को किसी आदमी ने उन्हें बाहर निकाल दिया जबकि गौशाला में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं। उनका यह बचकाना बयान इस बात को इंगित करता है कि गौशाला प्रबंधक कमेटी गौवंश व जिला कलेक्टर के आदेश के प्रति कितनी गंभीर है। कमोबेश बेसहारा गौवंश को लेकर जिले की हर गौशाला के यही हालात हैं। जिले की बहुत सी गौशालायें अपने संविधान का हवाला देकर इन बेसहारा गौवंश को लेने से मना कर देती है कि केवल देसी गौवंश के लिए ही यह गौशाला संचालित है परन्तु यह भी देखा गया है कि जब देशी गौवंश को गौशाला में छोड़ने के लिए लाया जाता है तो उन्हें दुधारु गौवंश ही चाहिए। सूत्रों की मानें तो इसमें सरकारी सिस्टम की खामियां भी उजागर हुई है, जैसे अनुदान की राशि एक साल से नहीं मिलना व कलेक्टर के आदेश को लेकर सरकारी अधिकारियों की मानिटरिंग का भी अभाव देखने को मिला। जिला प्रशासन की अगुआई में गौशालाओं के गौवंश को छप्पन खिलाएं लेकिन सड़कों पर लठ्ठ व कचरा खाते गौवंश की करूण पुकार भी सुने।
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