धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
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दादू माया का बल देखकर,आया अति अहंकार। अंध भया सूझे नहीं, का करि है सिरजनहार।। संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि धन से अज्ञानी प्राणियों को अहंकार हो जाता है कि मैं धनवान, मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है और वह धन के मद से ईश्वर को भी तिरस्कृत कर देता है। इसलिए धन से अंधा अहंकारी पुरुष विवेक विचार शून्य होने से अधोगति को प्राप्त होता है। अतः धन को धिक्कार है। हाथी, घोड़े, धन आदि को देखकर अभिमान मत करो क्योंकि यह सब क्षणभंगुर है। अंत में सबको त्याग कर जाना होगा। अतः सत्कर्मों को करते हुए सदैव परमात्मा का चिंतन ही करना चाहिए। आदि श्रीशंकराचार्य कहते हैं कि अर्थ को सदा ही अनर्थ करने वाला जानो, उसे तुम को जरा सा भी सुख नहीं मिलेगा। धनवानों को अपने कुटुंब, स्त्री, पुत्रादिको से भी भय बना रहता है। यह बात धन की तरह और पदार्थों में भी जान लेना चाहिए।

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