धार्मिक उपदेश: धर्म कर्म

AYUSH ANTIMA
By -
0
 

मन रे अन्त काल दिन आया, ताथै यहु सब भया पराया।। टेक॥ श्रवणों सुनैं न नैनहुं सूझै, रसना कह्या न जाई। सीस चरण कर कंपन लागे, सो दिन पहुंच्या आई॥ काले धोले वरण पलटिया, तन मन का बल भागा। जोबन गया जरा बिल आई, तब पछतावन लागा॥ आयु घटै घट छीजै काया, यहु तन भया पुराना। पांचों थाके कह्या न मानें, ताका मरम न जाना॥ हंस बटाऊ प्राण पयाना, समझ देख मन माहीं। दिन दिन काल गिरासे जियरा, दादू चेते नांहीं॥ अर्थात रे मन ! अब तेरा अन्तकाल आ गया है। अब तेरा धन भी पराया हो गया। कानों से सुनता नहीं, नेत्रों से दीखता नहीं। वाणी का बोल बन्द हो गया। हाथ, शिर, पैर कांपने लगे हैं। काले बाल सफेद हो गये। शरीर कुरूप और निर्बल हो गया। मन में भी विकलता छा गई। यौवन लुट गया। वृद्धावस्था आ गई। अब तू पश्चाताप करता है कि हाय, मैंने कल्याण के लिये कोई साधन नहीं किया, मेरी आयु ऐसे ही क्षीण हो गई। शरीर भी जीर्ण-शीर्ण हो गया। पाचों इन्द्रियों का ज्ञान भी प्राय: लुप्त हो गया, यह हंसात्मा भी जाने की जल्दी कर रहा है। प्राण भी प्राय: निष्प्राण से होते जा रहे हैं। हे मन ! अब भी सावधान होकर देख, यह काल तेरी आयु को प्रतिक्षण नष्ट कर रहा है और तू फिर भी नहीं चेतता। योगवासिष्ठ में लिखा है कि-जवानी, बचपन, शरीर और द्रव्य-संग्रह ये सबके सब अनित्य हैं और जल तरङ्गों की तरह एक भाव से दूसरे भाव को प्राप्त होते रहते हैं। इस संसार में प्राणियों का जीवन हवा से भरे हुए स्थान में रखी हुई दीपक की लौ के समान चंचल है अर्थात् शीघ्र ही जाने वाली है। तीनों लोकों के संपूर्ण पदार्थों की शोभा (चमक-दमक) बिजली के चमक के समान क्षणिक है। हे महर्षे ! उत्सव और वैभव से सुशोभित होने वाले दिन, ये महा प्रतापी पुरुष, ये प्रचुर सम्पत्तियां तथा बड़े बड़े कर्म सबके सब दृष्टि-पथ से दूर होकर केवल स्मरण के विषय रह गये। इसी तरह हम भी क्षण भर में अज्ञात स्थान को चले जायेंगे। यह संसार प्रतिदिन नष्ट और पैदा होता है। अत: आज तक इस नष्टप्राय: जले हुए इस संसार का अन्त नहीं हुआ। अत: सावधान होकर हरि भजन करना चाहिये।

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!