जयपुर की पहचान अब हवामहल और आमेर नहीं, बल्कि रोज़ाना का जाम बन गई है। शहर की सड़कों पर वाहनों का दबाव इस कदर बढ़ चुका है कि हर रोज़ लाखों लोग जाम में फँसकर अपनी रफ़्तार खो देते हैं। चारदीवारी के तंग रास्तों से लेकर नए इलाकों की चौड़ी सड़कों तक हालात एक जैसे हैं। अतिक्रमण, ठेलों की मनमानी, ई-रिक्शा का बेकाबू संचालन और प्रशासन की बेरुख़ी, यही है जयपुर की त्रासदी। अशोक गहलोत के प्रथम कार्यकाल के दौरान जोहरी बाजार आदि के बरामदे बड़ी मशक्कत के साथ खाली करवाए गए थे। युवा आईएएस मंजीत सिंह व आरएएस पवन अरोड़ा की जोड़ी ने इस ऑपरेशन को सफल बनाते हुए बरामदों को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया था। आज वही बरामदे अतिक्रमण के पुनः शिकार हो गये है। पुरोहितजी का कटला और चार दिवारी के तमाम बाजार, गलिया और रास्ते अवैध कब्जों की वजह से अपनी अहमियत खो चुके है। अगर कहीं आगजनी हो जाए तो दमकल की गाड़ी का निकलना दूभर हो जाएगा। सिर्फ जयपुर में ही हर साल करीब 1.40 लाख नए वाहन पंजीकृत होते हैं, जिनमें से 70 प्रतिशत से ज़्यादा दोपहिया हैं। यही वजह है कि शहर की सड़कें दम तोड़ रही हैं। ओटीएस, रामबाग सर्किल, गोपालपुरा पुलिया और अम्बेडकर सर्किल से रोज़ाना 15 से 20 लाख वाहन गुजरते हैं। ट्रैफिक लाइट्स की ग़लत टाइमिंग और बारिश में जल भराव इस मुसीबत को और विकराल बना देते हैं। पुलिस की कमी हालात को और बिगाड़ रही है। मानकों के मुताबिक जयपुर को जहाँ पांच हजार ट्रैफिक पुलिसकर्मी चाहिए, वहाँ मुश्किल से एक हजार से भी कम हैं। यही वजह है कि लालबत्ती तोड़ना, गलत साइड चलना और बिना हेलमेट दौड़ना आम हो गया है।
रामबाग सर्किल इसका ताज़ा उदाहरण है, जहाँ होटल रामबाग के सामने संकरी जगह और फुटपाथ की ग़लत चौड़ाई के चलते नारायण सिंह सर्किल की ओर जाने वाला ट्रैफिक हमेशा जाम में घुटता है। सहकार मार्ग का जेपी फाटक भी ठेलों और अवैध कब्ज़ों की वजह से घंटों जाम का गवाह बनता है। ठेले वालो की मनमानी और उद्दंडता को यहां बखूबी देखा जा सकता है। कमोबेश समूचे शहर के हालात यही है। जयपुर विकास प्राधिकरण और ट्रैफिक विभाग की उदासीनता ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया है। नतीजा यह है कि जयपुर अब पर्यटन से ज़्यादा जाम के लिए सुर्ख़ियों में आ रहा है। गुलाबी नगरी का गौरव बचाना है तो सख़्त कानून, पर्याप्त पुलिस बल और अतिक्रमण मुक्त सड़कें अब अनिवार्य हैं। वरना यह शहर धीरे-धीरे अपनी रफ़्तार और पहचान दोनों खो देगा। जयपुर की यातायात व्यवस्था अब एक विशाल समस्या बन चुकी है। शहर के 403 मुख्य सर्किल और चौराहों पर सिर्फ 1498 ट्रैफिक जवान तैनात हैं, जबकि स्वीकृत पद 2935 हैं अर्थात् 72 फीसदी ट्रैफिक पुलिस की भारी कमी। शहर के 156 पॉइंट पर पुलिसकर्मी तैनात नहीं हैं, जिससे घंटों तक ट्रैफिक जाम की स्थिति रहती है। टोंक रोड, जेएलएन मार्ग, अजमेर रोड और सीकर रोड जैसे प्रमुख मार्गों पर रोज़ाना लाखों वाहन आते-जाते हैं, जाम आम बात बन गई है। शहर में निजी वाहनों और ई-रिक्शा की अनियंत्रित बढ़ोतरी ट्रैफिक सिस्टम को पंगु बना रही है। बिना सलाह, मनमाने तरीके से रूकना-चलना और गलत पार्किंग हर सड़क को बाधित करते हैं। बीपीआरडी के मानकों के अनुसार 850 वाहनों पर एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी होना चाहिए, लेकिन मौजूदा हालात में एक जवान पर कहीं 3500 तो कहीं 4500 वाहन आ जाते हैं। मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के लिए उच्च स्तरीय बैठक ली। दीर्घकालीन कार्ययोजना हेतु विभिन्न विभागों को मिलकर सामूहिक जिम्मेदारी सौंपने के निर्देश दिए गए। शहर में वन-वे ट्रैफिक व्यवस्था, बस स्टैंडों का स्थानांतरण, मल्टीलेवल पार्किंग, जोन-आधारित ई-रिक्शा संचालन और जब्त रिक्शाओं के लिए यार्ड जैसी पहलें सुझाई गई। यातायात नियमों के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई और प्रमुख चौराहों को सिग्नल फ्री बनाने की योजना बनाई गई।
प्रमुख चौराहों पर पुलिसकर्मी तैनात हैं लेकिन छोटे रास्तों, कट्स और कालोनियों में जाम का नासूर उभर रहा है। वीवीआईपी मूवमेंट और बरसात के मौसम में जाम कई किलोमीटर लंबा हो जाता है। नियोजित कार्यों की प्रभावशीलता, पार्किंग प्रबंधन और ट्रैफिक मॉनिटरिंग स्थाई समाधान से अभी दूर हैं।
*महेश झालानी, वरिष्ठ पत्रकार*