एक पुरानी कहावत है—सौ को खिलाया, एक को हंगाया। इसका सरल अर्थ है कि इंसान भूख से कम, लेकिन शौच न कर पाने से अधिक परेशान होता है। यह कहावत हमें बताती है कि भोजन महत्वपूर्ण है, पर शौच एक ऐसी जरूरत है, जिसे टाला नहीं जा सकता। इसी सच्चाई को समझाने के लिए हर वर्ष 19 नवंबर को विश्व शौचालय दिवस मनाया जाता है। यह दिन याद दिलाता है कि शौचालय केवल सुविधा नहीं, बल्कि मानव गरिमा और स्वास्थ्य का आधार है।
शौचालय न होने या अस्वच्छ होने से
* पेट संबंधी रोग फैलते हैं।
* पानी दूषित होता है।
* महिलाओं और बच्चों को असुरक्षा झेलनी पड़ती है।
* और व्यक्ति मानसिक व शारीरिक कष्ट से गुजरता है।
यही वजह है कि भोजन की कमी कुछ समय सहन की जा सकती है, लेकिन शौचालय की कमी जीवन को तुरंत प्रभावित करती है। कहावत का यही सार इस दिवस का मुख्य संदेश बन जाता है। हमारे देश में स्वच्छ भारत मिशन के तहत लाखों शौचालय बने, लेकिन उनका निरंतर उपयोग, पानी की उपलब्धता और सफाई आज भी महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं। जब तक शौचालय स्वच्छ और उपयोग योग्य नहीं रहेंगे, तब तक यह बुनियादी सुविधा अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाएगी। विश्व शौचालय दिवस हमें यही सिखाता है कि—
स्वास्थ्य, सम्मान और स्वच्छता की शुरुआत एक स्वच्छ शौचालय से होती है और कहावत हमें याद दिलाती है कि मानव जीवन की वास्तविक प्राथमिकताएँ क्या हैं भूख बाद में, शौच पहले।
*@ रुक्मा पुत्र ऋषि*