शहीद कैप्टेन जगदेव सिंह पूनिया की स्मृति में प्रतिवर्ष होने वाली दो दिवसीय खेल प्रतियोगिता का आयोजन

AYUSH ANTIMA
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पिलानी (राजेन्द्र शर्मा झेरलीवाला): भारत पाक युद्ध 1971 में वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपने प्राणों को बलिदान करने वाले शहीद कैप्टेन जगदेव सिंह पूनिया जी की स्मृति में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली दो दिवसीय खेल प्रतियोगिता के 54वें संस्करण का उद्घाटन 03 दिसम्बर 2025 को प्रातः साढ़े नौ बजे झुंझुनूं जिले के ग्राम बनगोठड़ी में होने जा रहा है।

*शहीद का जीवन परिचय:*

कैप्टेन जगदेव सिंह पूनियां का जन्म राजस्थान के झुंझुनू जिले में पिलानी के निकट ग्राम बनगोठड़ी खुर्द में 03 जुलाई 1945 को पिता राइफलमैन हंसराम पूनिया और माता श्रीमती जमना देवी की कोख से हुआ था। बचपन से ही वे बहुत होनहार थे। उन्होंने हायर सेकंडरी गांव के राजकीय विद्यालय से ही की। उन्होंने बीए मुकुंदगढ से की। वे विद्यार्थी काल में वालीबॉल, कबड्डी और एथलेटिक्स के राष्ट्रीय स्तर के उत्कृष्ट खिलाड़ी थे। राजस्थान विश्वविद्यालय से एमए करते समय वर्ष 1968 में उनका चयन अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी (OTA) के लिए हो गया। एक वर्ष के कठोर प्रशिक्षण के बाद भारतीय सेना की 19वी राजपुताना राइफल्स में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन प्राप्त हुआ। इस प्रकार उन्हें 23 वर्ष की आयु में गांव के पहले कमीशंड ऑफिसर बनने का गौरव प्राप्त हुआ। 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय, कैप्टन पूनियां अपनी बटालियन की अल्फा (A) कंपनी की अगुवाई कर रहे थे। 4 दिसंबर 1971 को अग्रिम मोर्चे पर दुश्मन से भीषण युद्ध के बाद दुश्मन की मजबूत रक्षा पंक्तियों को पार करने में सफल रहे और भारी गोलीबारी के बावजूद अपनी टीम को प्रेरित करते रहे। उन्होंने दुश्मन के कई ठिकानों को नष्ट कर दिया, लेकिन इस हमले के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए और एक दुश्मन मोर्चे पर कब्जा करने के दौरान 26 वर्ष की अल्पायु में वीरगति को प्राप्त हो गए। यह हमला इतना भीषण था कि कंपनी में कैप्टेन पूनियां सहित कुल ग्यारह सैनिक शहीद हुए। इस हमले के बाद भारतीय सेना की इस बहादुर कंपनी ने दुश्मन के लगभग 4 टन गोला-बारूद और हथियार बरामद किये। कैप्टेन पूनियां की अगुवाई में हुए इस हमले में प्रशंसा करते हुए भारतीय सेना ने 19 राजरीफ को थिएटर ओनर से सम्मानित किया।

*प्रतियोगिता का महत्व*

उनके बलिदान को हमेशा याद रखने और युवा पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए उनके पिताजी ने ग्रामवासियों के सहयोग से 3-4 दिसम्बर 1972 से हर वर्ष खेलों का आयोजन शुरू किया। इसी कड़ी में ग्रामवासियों द्वारा वर्ष 1976 में गांव के राजकीय विद्यालय के सामने उनका शहीद स्मारक बनवाया तथा उनकी प्रतिमा स्थापित की। ग्रामवासियों व उनके परिवार द्वारा 1972 से लेकर अब तक हर साल उनके बलिदान दिवस 3-4 दिसंबर पर भव्य खेलों का आयोजन करवाया जाता है, जिसमें पूरे देशभर से टीमें भाग लेने आती हैं। इन खेलों से प्रेरित होकर गाँव और क्षेत्र के अनेकों युवा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन करते रहे हैं और देश सेवा में अपना अमूल्य योगदान दे रहे है ।

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