कहावत है कि बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की। क्या अंता विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी सुमन मोरपाल की करारी हार से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की मुट्ठी भी खुल गई है। हाडौती क्षेत्र में वसुंधरा भाजपा की एक छत्र नेता है और राजस्थान में भी पार्टी में उनका बड़ा प्रभाव है। भले ही वह तीसरी बार मुख्यमंत्री नहीं बन पाई हो, लेकिन अभी भी उनके पास कई विधायकों और नेताओं का समर्थन है लेकिन अंता चुनाव में अपनी पसंद के प्रत्याशी के हारने से उनकी राजनीतिक ताकत की मुट्ठी को खोल दिया है, जब राज्य में भाजपा की सरकार हो, जब संगठन का मुखिया भी उनका करीबी हो, जब उपचुनाव की पूरी बागडोर उनके पुत्र दुष्यंत सिंह के पास हो और उसे वसुंधरा खुद निर्देशित कर रही हो, जब झालावाड़ और बारां वसुंधरा का गढ़ हो तब मोरपाल की हार भाजपा से ज्यादा वसुंधरा के लिए झटका है। ओवर कांफिडेंस और अहंकार उन्हें भारी पड़ गया। पिछले कुछ समय से पार्टी में हाशिए पर चल रही राजे के लिए अंता का चुनाव एक मौका था यह बताने का, कि राजनीतिक रूप से वह अभी खत्म नहीं हुई है और मतदाता आज भी उन्हें पसंद करता है। साथ ही अगर अंता चुनाव वो जिता देती, तो भविष्य में राजस्थान मंत्रिमंडल और संगठन के विस्तार में उनकी जरूर सुनी जाती लेकिन ये हार उनकी राजनीतिक ताकत, समर्थन और सौदेबाजी पर करारा प्रहार है। हालांकि मुख्यमंत्री के नाते भजन लाल शर्मा भी हार के जिम्मेदार माने जाने चाहिए, क्योंकि कोई भी उपचुनाव सरकार के कामकाज और उसकी परफॉर्मेंस पर भी मोहर होता है। पिछले साल जब सात सीटों पर उपचुनाव हुए थे और भाजपा ने उसमें से पांच जीते थे, तब उसका श्रेय भजन लाल सरकार के कामकाज को दिया गया था लेकिन अंता की हार का ठीकरा उन पर नहीं वसुंधरा राजे पर ही फूटेगा। इसका कारण भी है, पर्ची मुख्यमंत्री के रूप में विख्यात शर्मा का इस चुनाव में ज्यादा हस्तक्षेप नहीं था। वो पार्टी की दिखावटी एकता के लिए महज रोड शो करने वहां गए। उम्मीदवार चयन से लेकर प्रचार अभियान तक सब कुछ वसुंधरा के हाथ में था। सारी रणनीति उनकी थी, इसलिए जिम्मेदार भी शर्मा से ज्यादा वहीं ठहराई जाएंगी। फिर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने भी यह कहकर की अंता में हार की जिम्मेदारी पार्टी का मुखिया होने के नाते उनकी है, शर्मा का बोझ उतार दिया। इसमें कोई शक नहीं है कि भाजपा का एक धड़ा नहीं चाहता था कि अंता में मोरपाल की जीत हो। वसुंधरा विरोधी यह गुट कौनसा है, यह राजनीति की समझ रखने वाले हर व्यक्ति को पता है लेकिन खुद वसुंधरा ने भी अपनी प्रतिष्ठा दाव पर होने के बाद भी सबको साथ लेकर चलने के बजाय अकेले ही अपने दम पर मोरपाल को जिताने की रणनीति बनाई, जो उन्हें भारी पड़ गई। भाजपा को भी शायद ये उम्मीद थी कि वसुंधरा का हाडोती में आभामंडल और उनकी बंद मुट्ठी भाजपा को आसानी से जीत दिला देगी। तमाम मीडिया रिपोर्ट और विश्लेषण भी थोड़ी सी टक्कर के बाद मोरपाल को विजयी बता रहे थे। टक्कर तो मोरपाल ने ली, लेकिन विधायक बने प्रमोद जैन भाया से नहीं, बल्कि निर्दलीय नरेश मीणा से। तीसरे नंबर पर आने से बचने के लिए वह मीणा से मतगणना के अंतिम दौरों में 159 वोट ज्यादा हासिल कर नंबर दो पर आ पाए। भाजपा के बड़े नेताओं ने अंता से प्रचार में दूरी रखी। स्थानीय नेताओं को भी प्रचार से दूर रखा गया। क्षेत्र में धाकड़ वोट ज्यादा होने के बावजूद मंत्री हीरालाल नागर और मीणा वोट होने के बावजूद किरोड़ी लाल मीणा को नहीं बुलाया गया। मदन दिलावर की भी उपेक्षा की गई, नागौर और दिलावर बारां जिले के ही हैं। अंता की हार वसुंधरा के लिए बड़ा झटका इसलिए भी है कि अब उनके वो समर्थक विधायक भी उनसे छिटक सकते हैं, जो अब तक उनके भरोसे मंत्रिमंडल या संगठन में आने को लेकर निश्चिन्त थे लेकिन इस हार से वसुंधरा की बारगेनिंग पावर कम होगी। जहां तक इस हार का मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा से संबंध है, उन्हें कुछ खतरा नहीं है। पर्ची मुख्यमंत्री के रूप में ख्याति रखने वाले शर्मा दिल्ली के यस मैन है और भाजपाई और जनता भी जानती है कि राजस्थान में असली राज ब्यूरोक्रेसी का है यानी अफसरशाही का है। पहले मुख्य सचिव सुधांश पंत इसकी अहम भूमिका में थे। जब उन्हें दिल्ली बुला लिया गया है तो वहीं से सीएस बनाकर वी़. श्रीनिवास को भेजा जा रहा है यानी सीएम की भूमिका में बदलाव नहीं आएगा। अंता की हार भाजपा के लिए यह संकेत है कि उसमें सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। गुटबाजी और नेताओं की महत्वकांक्षाएं बढ़ती जा रही है। बड़े नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से कार्यकर्ता परेशान है, फिर सरकार बनने के करीब 2 साल हो जाने के बाद भी कार्यकर्ता के हाथ खाली है। निगमों-बोर्डो सहित अन्य राजनीतिक नियुक्तियां नहीं की गई है। मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा हर एक दो माह में होती है लेकिन फिर ठंडी पड़ जाती है। डेढ़-दो साल बाद भी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ अपनी टीम का गठन नहीं कर सके हैं। यानि वही सब कुछ नजर आ रहा है, जो पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार में था। यानी हावी अफसरशाही, नेताओं की महत्वकांक्षाएं, कार्यकर्ताओं की अपेक्षा, नेताओं की गुटबाजी। अभी सरकार के 3 साल बाकी हैं और अगर भाजपा ने फैल रहे रायते को तुरंत नहीं समेटा तो फिर राजस्थान में एक बार कांग्रेस व एक बार भाजपा की सरकार बनने की परंपरा जारी रह सकती है लेकिन क्या मोदी-शाह की जोड़ी ऐसा होने देगी।
*@ ओम माथुर*
*वरिष्ठ पत्रकार*