कल रावण से मुलाकात हो गई, बातों ही बातों में बात हो गई, मैंने कहा क्या अकड़ दिखाते हो, दशहरे को तुम जलाये जाओगे।
रावण खिल खिलाकर हंस पड़ा, बोला इसमें कौनसी बड़ी बात है, हर साल जलाया जाता हूं, फिर भी आपके बीच में पाया जाता हूं। अज्ञान के अंधकार में, कालाबाजारी के व्यापार में, पद के अभिमान में, मोह के अहंकार में, वासना की आग में गला काट दौड़ भाग में, लाल फीताशाही में, भ्रष्टाचार की कमाई में। मैंने कहा बस करो बस करो...मैं जोर से चिल्लाया, पत्नी बोली क्या कोई सपना आया, मैंने कहा, था तो सपना लेकिन वर्तमान की हकीकत है, आओ जल्दी से तैयार हो जाओ, रावण के पुतले के साथ, इन बुराइयों को भी जलाते हैं। कहे कवि अनमोल
आओ मिलकर के दशहरा मनाते हैं।।