सोई राम सँभाल जियरा, प्राण पिंड जिन दीन्हा रे। अम्बर आप उपावन हारा, मांहि चित्र जिन कीन्हा र॥टेक॥ चंद सूर जिन किये चिराका, चरणों बिना चलावै रे। इक शीतल इक तारा डोलै, अनन्त कला दिखलावै रे॥१॥nधरती धरनि वरन बहु वाणी, रचिले सप्त समंदा रे। जल थल जीव सँभालन हारा, पूर रह्या सब संगा रे॥२॥ प्रकट पवन पानी जिन कीन्हा, वरषावै बहु धारा रे। अठारह भार वृक्ष बहु विधि के, सबका सींचनहारा रे॥३॥पँच तत्त्व जिन किये पसारा, सब करि देखन लागा रे। निश्चल राम जपो मेरे जियरा, दादू तातैं जागा रे॥४॥ हे मन ! जिस परमात्मा ने शरीर रचा तथा उसमें प्राणों का संचार किया तूं उस भगवान् को भज। जिसने विचित्र आकाश को बनाया। उसमें चन्द्रमा और सूर्य दो दीपक बनाये हैं। चन्द्रमा अपने शीतल किरणों से तथा सूर्य उष्ण किरणों से जगत् की सेवा करते हुए इस महाकाश में घूम रहे हैं। इसी तरह महाकाश में अनन्त ज्योतिगण उस परमात्मा की महिमा को प्रकाशित कर रहे हैं। अनेक रंग-बिरंगी विशाल पृथिवी को बनाया सात समुद्र तथा जल स्थल आकाश में अनन्त जीवों को पैदा किया तथा अनन्त वर्षा की धारा को वर्षाता है। अठारह भर वनस्पतियों को बनाकर जल से उनका सिंचन करता है। पाँच तत्त्वों को बनाकर उनके द्वारा पाँच भूतों की रचना करके उन्हीं भूतों से सकल जगत् को बनाया सबको साक्षिभाव से देखता रहता है। उसी नारायण भगवान् का तूं भजन कर। जितने भी प्रबुद्ध ज्ञानी पुरुष हुए हैं, वे सभी नाम साधना से ही जागे हैं। कठोपनिषद् में लिखा है कि –
जिस परमात्मा से सूर्य प्रकट होता है और उसी में विलीन हो जाता है और उसी में सभी देवता प्रविष्ट हैं। उस परमेश्वर की महिमा को कोई नहीं जान सकता और उसकी व्यवस्था का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता है। उस परमेश्वर से प्राण उत्पन्न होता है तथा अन्तःकरण समस्त इन्द्रियां आकाश वायु तेज जल और विश्व को धारण करने वाली पृथिवी उत्पन्न हुई। उसी से अग्नि जिसकी समिधा (इन्धन) सूर्य है। अग्नि से सोम, सोम से मेघ और मेघों से वर्षा द्वारा पृथिवी में औषधीयें उत्पन्न हुई। उनके खाने से जो वीर्य उत्पन्न होता है। उसका पुरुष स्त्री में सिंचन करता है जिससे सन्तान उत्पन्न होती है।
इसी प्रकार उस पुरुष से ही नाना प्रकार के जीव उत्पन्न हुए। उसी से समुद्र पर्वत उत्पन्न हुए। इन्हीं से अनेक प्रकार की नदियाँ निकल कर बह रही है। इसी से औषधियों का रस उत्पन्न हुआ है। जिस रस से पुष्ट हुए शरीर में यह अन्तरात्मा परमेश्वर प्राणियों की आत्मा के सहित उनके हृदय में स्थित हैं, अतः हे मन ऐसे प्रभु का भजन कर।