साथी आज आसमा का थानेदार बन गया। चाह थी कंधे पे सितारों की, खुद आज दूर कहीं सितारा बन गया।।
थी चाह हाथ पीले कर दे बहन के, थी जिम्मेदारी पिता की बिगड़ती हालत की। भर्ती रद्द की रट ने, उसने भी ठानी पुन: परीक्षा देने की।।
सफेद चोलों की चालों ने उसके घर की रोशनी बुझा दी।
उसकी बूढ़ी मां देख रही है राह उसकी, नाकाम तंत्र, लचर न्याय पालिका और कुछ छुटभैया नेताओं ने उसकी घर की राह में
उसकी ही लाश बिछा दी।।
ओछी राजनीति, अंधी सरकार।
करो मिलकर साजिशे, क्या कोई लौटा पायेगा हमारा भाई, हमारा यार।।
क्या कोई चुका सकता है मूल्य
उस माँ के मातृत्व का, जिसने सींचा था उस पुत्र को, जो आज उसकी आंख का कभी न खत्म होने वाला आंसुओं का सैलाब बन गया।
क्या इसी दिन के लिए उसने कई नौकरियों से त्याग पत्र देके
इतना बड़ा बलिदान चुना, कहां तो उसे थी परवाह पूरे परिवार की, आज कैसे उसने यह मौत का हार चुना।।
लड़ेंगे ऐ योद्धा ! तेरे हक़ की भी हम मिलकर लड़ाई। नाहक न जाने देंगे तेरे अधूरे सपने, जागकर बिताई रातें और तेरी आखिरी पढ़ाई शहादत को सलाम ।।