लद्दाख/दिल्ली: लेह, लद्दाख में केंद्र सरकार के खिलाफ छात्रों का बड़ा प्रदर्शन केवल एक स्थानीय असंतोष नहीं माना जा सकता। पूर्ण राज्य की मांग के नाम पर प्रदर्शनकारियों द्वारा CRPF की गाड़ी में आग लगाना न सिर्फ कानून और सुरक्षा व्यवस्था के खिलाफ सीधी चुनौती है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि आखिर इस हिंसा के पीछे कौनसी ताक़तें काम कर रही हैं। लद्दाख का संवेदनशील भौगोलिक महत्व किसी से छिपा नहीं। चीन पहले ही गलवान से लेकर पैंगोंग झील तक कब्ज़े और दबाव की नीति अपनाए बैठा है। ऐसे में अगर छात्र संगठन हिंसक आंदोलन की ओर बढ़ते हैं तो यह समझना होगा कि क्या यह केवल "पूर्ण राज्य" की मांग है या इसके पीछे किसी एजेंसी और अंतरराष्ट्रीय लॉबी की योजना छिपी है। भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाकर लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया था। इससे चीन और पाकिस्तान दोनों की रणनीति पर सीधा असर पड़ा। इन दोनों पड़ोसी देशों के लिए लद्दाख रणनीतिक रूप से भारत की सुरक्षा ढाल है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का असंतोष, आंदोलन या हिंसा इन शत्रु देशों के हित में जाता है। यह आशंका भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि लद्दाख के छात्रों के बीच कुछ तत्वों ने घुसपैठ की हो, जो उन्हें गुमराह कर हिंसा की राह पर धकेल रहे हैं। हिंसा करने का अर्थ यह है कि वे लोकतांत्रिक दायरे से बाहर निकलकर उन्हीं ताक़तों को मज़बूत कर रहे हैं, जो लद्दाख की ज़मीन पर भारत के खिलाफ नज़र गड़ाए बैठी हैं।
इस आंदोलन को देशहित में परखने की ज़रूरत है। यदि यह आंदोलन केवल "पूर्ण राज्य" के सवाल पर केंद्रित है तो उसे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक दायरे में रहकर उठाना चाहिए लेकिन यदि यह हिंसक रूप ले रहा है और सुरक्षा बलों को निशाना बना रहा है, तो निश्चित रूप से यह किसी साजिश की गंध देता है। भारत सरकार को चाहिए कि वह इस घटनाक्रम की गहन जांच कराए और यह पता लगाए कि छात्रों को हिंसा की ओर धकेलने वाले लोग कौन हैं। साथ ही, यह समय है जब लद्दाख के युवाओं को समझना होगा कि हिंसा से उनका क्षेत्र चीन और पाकिस्तान की चालों का शिकार बनेगा। लद्दाख का भविष्य सुरक्षित रखने का अर्थ है भारत की सीमाओं को सुरक्षित रखना। इसलिए इस आंदोलन को केवल स्थानीय असंतोष न मानकर इसकी जड़ों तक पहुँचना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है।