जयपुर (श्रीराम इंदौरिया): राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (NIA), जयपुर के पंचकर्म विभाग द्वारा एक निःशुल्क पंचकर्म शिविर का आयोजन किया जा रहा है। इस शिविर में पित्त और रक्त दोष से संबंधित विकारों के उपचार के लिए शारदीय विरेचन (Therapeutic Purgation) और रक्तमोक्षण (Bloodletting Therapy) जैसी पंचकर्म चिकित्साएं निःशुल्क प्रदान की जा रही हैं। यह शिविर आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार शरीर के डिटॉक्स और शुद्धिकरण पर केंद्रित है। शारदीय विरेचन और रक्तमोक्षण चिकित्सा के माध्यम से पित्त दोष एवं रक्त दोष से संबंधित समस्याओं जैसे त्वचा रोग, रक्त विकार, तिल्ली रोग और गुदा रोग का उपचार किया जा रहा है। वहीं, रक्त शुद्धि और त्वचा रोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। इस शिविर का मुख्य उद्देश्य आम जनता को आयुर्वेद की प्राचीन और प्रभावी चिकित्सा पद्धतियों से लाभान्वित करना है। शिविर में रोगियों को अनुभवी आयुर्वेदाचार्यों द्वारा परामर्श और उपचार दिया जा रहा है। शिविर का समय प्रतिदिन सुबह 9:00 बजे से दोपहर 2 बजे तक है। मुख्य अतिथि, कुलपति प्रोफेसर संजीव शर्मा ने शिविर का उद्घाटन करते हुए कहा कि यह शिविर न केवल हमारे संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि आयुर्वेद आज भी हमारे समाज के लिए कितना प्रासंगिक है। पंचकर्म, आयुर्वेद की एक ऐसी अद्भुत चिकित्सा पद्धति है, जो केवल रोगों का उपचार ही नहीं करती, बल्कि शरीर का पूर्ण शुद्धिकरण और कायाकल्प करती है। इस शिविर में दी जा रही शारदीय विरेचन और रक्तमोक्षण जैसी चिकित्साएं पित्त और कफ से संबंधित विकारों में विशेष रूप से प्रभावी हैं। यह हमें रोगों की जड़ तक जाकर उन्हें खत्म करने का अवसर देती हैं। विभागाध्यक्ष डॉ.गोपेश मंगल ने कहा
कि आज हमारे विभाग द्वारा आयोजित इस निःशुल्क पंचकर्म शिविर में वर्षा ऋतु में संचित दोष को शरद ऋतु में शरीर से बाहर विरेचन एवं रक्त मोक्षण के द्वारा निकाला जाता है, रक्तमोक्षण जैसी चिकित्साओं के माध्यम से लोगों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करने का प्रयास कर रहे हैं। ये उपचार न केवल रोग को ठीक करते हैं, बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते हैं। यह रोगी एवं स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभप्रद है।