चुनौतियों का सफर

AYUSH ANTIMA
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देश को सीपी राधाकृष्णन के रूप में नया उप राष्ट्रपति मिला है। उनकी जीत कोई अप्रत्याशित जीत नहीं है।‌ विपक्षी गठबंधन ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज बी सुदर्शन रेड्डी को चुनावी समय में उतार कर जो मैसेज देने का प्रयास किया, उसमें काफी हद तक सफल भी रहे। देखा जाए तो उपराष्ट्रपति चुनाव को वोटों की गणित व राजनीतिक समीकरणों से नहीं तौलना चाहिए। विदित हो संसद के सत्र के बीच जगदीप धनखड़ के त्यागपत्र के बाद उप राष्ट्रपति के चुनाव करवाने पड़े। भारतीय संसदीय प्रणाली के इतिहास में यह पहला अवसर है कि उप राष्ट्रपति ने अचानक पद छोड़ा हो। नवनियुक्त उप राष्ट्रपति के समक्ष बहुत सी चुनौतियां हैं, जब सरकार और विपक्ष के मध्य असहमति की ऊंची दीवार खड़ी हो गई हो। उप राष्ट्रपति से यह उम्मीद की जा सकती है कि वे पक्ष और विपक्ष में संतुलन बनाए रखने के साथ ही निरपेक्ष का प्रदर्शन भी करेंगे। इसके साथ ही यह गरिमामय पद अराजनीतिक होता है और उनके सामने इस पद की गरिमा को बनाए रखना भी चुनौती होगी।‌ जैसा कि पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के साथ बहुत ही राजनीतिक विवाद जुड़ चुके थे। विपक्ष की आम शिकायत रहती थी कि धनखड़ ऊनको मौके नहीं देते। ऐसे समय में सीपी राधाकृष्णन के समक्ष यह भी चुनौती रहेगी कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परम्पराओं को कैसे जीवित रखा जाए। इसके साथ ही देश के उच्च सदन राज्यसभा की गरिमा को वापिस दिलाने के साथ ही आमजन को विश्वास दिलाना होगा कि उच्च सदन जनहित के मुद्दों के लिए संवेदनशील है और उन पर सार्थक चर्चा होगी। वैसे देखा जाए तो मानसून सत्र शोर शराबे की भेंट चढ़ने के साथ ही कार्य क्षमता का स्कोर 38.8 प्रतिशत ही रहा है। इसके साथ ही सदन के माननीय सदस्यों को भी चाहिए कि संसदीय परम्पराओं का निर्वहन करते हुए इसकी गरिमा बनाए रखी जाए। संसदीय व हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष कमजोर नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही संसद का सुचारू रूप से संचालन में सत्ता पक्ष व विपक्ष की बराबर की जिम्मेदारी होती है। सुचारू रूप से संचालन में दोनों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। अतः सदन में व्यवधान को लेकर केवल विपक्ष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। सत्ता पक्ष को भी इसमें सहयोग और आम सहमति के स्वरों के साथ सदन के सूचारू रूप से संचालन की आशा सभापति रखते हैं। अब आने वाला समय ही निर्धारित करेगा कि उप राष्ट्रपति के समक्ष जो सबसे बड़ी चुनौती सदन का सुचारु रूप से संचालन कर उसकी खोई छवि को कैसे पटरी पर लाते है।

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