हमारा समाज समय और शिक्षित समाज के रूप में जाना जाता है। दहेज व इसको लेकर होने वाली हत्या आज भी यह गंभीर सामाजिक बुराई हमारे समाज में विद्यमान है। इसको लेकर हमें सोचना होगा कि हमारी विकास की दिशा क्या रही है। प्रतिदिन दहेज के लिए किसी महिला को प्रताड़ित करने के मामले प्रकाश में आते रहे हैं। कई मामलों में यह देखा गया है कि लोग किस तरह संकीर्णता, जड़ता और पिछड़े मानस से ग्रस्त हैं व लोभ में कितने अमानुष व क्रूर हो जाते हैं। ससुराल में उसका पति व घर वाले लगातार दहेज की मांग करते हुए प्रताड़ित करते रहते हैं। महिला जब उनकी मांगों को पूरा नहीं करती है या यह कहें कि हर बात की सीमा होती है और जब सीमा के बाहर निकल जाती है तो उनकी मांगों के बारे में असमर्थता जाहिर करती है तो उसकी हत्या कर दी जाती है। हमारी चमकती अर्थव्यवस्था को इस तरह की अमानवीय घटनाएं धुमिल करती है। देश में दहेज विरोधी कानून होने के बावजूद कोई व्यक्ति कैसे दुस्साहस कर पाता है, यह सोचनीय विषय है। ऐसा लगता है कि ऐसी घटनाएं करने वालों के मन में कानून का कोई डर नहीं है क्योंकि जब दहेज प्रताड़ना के मामले न्यायालय में जाते हैं देश की कानून व्यवस्था जटिल और लंबी होने के कारण कानूनी प्रक्रिया के चलते इनकी सुनवाई वर्षों तक खींची चली जाती है व ऐसे मामलों में कुछ अपराधी बच निकलते हैं या फिर सजा की दर भी बहुत कम है। दहेज विरोधी कानून को लेकर यह भी अवधारणा लोगों के मन में है कि इस कानून की आड़ में दुरूपयोग भी किया जाता है कि उसके पति व परिवार के सदस्यों को फंसाने की कोशिश की जाती है लेकिन इतना तय है कि जब दहेज को लेकर ऐसी परिस्थितियां बनती है और परिवार के लोग मूकदर्शक होकर देखें उनकी भी इस अपराध में बराबर की भागीदारी है। दहेज को लेकर क्रूर अपराध इस बात का सूचक है कि अभी हमारे सभ्य और शिक्षित होने व विकास के वास्तविक पैमाने बहुत दूर है। इस सामाजिक बुराई को लेकर हर समाज के सगठनो का भी उत्तरदायित्व बनता है कि समाज में सेमिनार के जरिये इसको लेकर जागरूकता पैदा की जाए युवा पीढ़ी को भी इस सामाजिक बुराई से दूर रहने के लिए प्रेरित किया जाए ।
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