बिन देखै जीवै नहीं, विरह का सहिनाँण। दादू जीवै जब लगै, तब लग विरह न जाण।।
संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज, उत्तम विरह का लक्षण बता रहे हैं भक्तों का जीवन भगवत दर्शन के लिए ही है। यदि क्षण मात्र भी भगवान के दर्शन न हो तो भक्त के प्राण भक्त के शरीर को तत्काल त्याग देते हैं। यदि वह भक्त फिर भी जीता है तो समझ लेना चाहिए कि भगवत विरह पैदा ही नहीं हुआ था क्योंकि विरह का लक्षण ही यह है कि विरही, उसे देखे बिना जीता ही नहीं है। विरह तो भक्तों के हृदय को तपाकर शुद्ध कर देता है, जैसे सुनार सोने को तड़पा कर शुद्ध करता है। हृदय के शुद्ध होने से साधक भक्ति के योग्य हो जाता है। भक्ति से भगवान की प्राप्ति निश्चित है। अतः विरह को भक्तों का मित्र ही जानना चाहिए, न कि शत्रु, जो वीरह को शत्रु तुल्य मानता है वह विरह के महत्व को नहीं जान सकता। श्रीमद्भगवद गीता में जो भक्त मुझे श्रद्धा से भजता है, वह मुझे सबसे अच्छा लगता है। उन भक्तों में भी ज्ञानी भक्त नित्य मेरे में लगे रहने से, उसकी भक्ति एकनिष्ठ हो जाने के कारण विशिष्ट भक्ति कहलाती है। क्योंकि ज्ञानी भक्तों को मैं अत्यधिक प्रिय हूँ और मुझे भी ज्ञानी भक्त बहुत प्रिय है। अतः विरही भक्त निरन्तर हरिनाम रटते हुये मुख से निकले हरिनाम से जगत को पवित्र करते हुए तथा आनन्द की अश्रुधारा बहाते हुए हरिनामरूपी अमृत का पान करते करते भगवतरूप बन जाते है।